Friday, September 14, 2018

आदेश को अब 18 साल हो गए हैं मगर आगरा और ता

सुप्रीम कोर्ट के 1996 के आदेश को अब 18 साल हो गए हैं मगर आगरा और ताज महल के आसपास प्रदूषण की मात्रा गंभीर रूप धारण करती चली गयी. बीबीसी से बात करते हुए मेहता ने अफ़सोस जताया कि सुप्रीम कोर्ट के  के आदेश से ही काफी कुछ बदल सकता था. मगर ऐसा नहीं हुआ और उन्हें फिर से अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा.
वहीं पर्यावरणविदों ने यमुना को ही प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत माना. पर्यावरणविद बृज खंडेलवाल एक लंबे अरसे से यमुना के प्रदूषण को लेकर आवाज़ उठाते रहे हैं.
आगरा में आते-आते यमुना एक नाले का रूप धारण कर लेती है. इसका पानी रुक जाता है और दिल्ली से लेकर आगरा तक नदी के किनारे बने उद्योग अपना कचरा सीधे यमुना में डालते रहे हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, आगरा शहर के सभी नाले, जिनकी संख्या 90 के आस पास है, सीधे बिना किसी तरह के 'ट्रीटमेंट' के यमुना में आकर गिरते हैं.
बीबीसी से बातचीत में खंडेलवाल ने कहा, चूँकि यमुना सूख रही है इसलिए धूल के कण हवा की वजह से सीधे ताज महल पर जाकर गिरते हैं. इसके अलावा शहर भर का कचरा भी यमुना के किनारे ही डाल दिया जाता है जिस कारण मक्खी, मच्छरऔर दूसरे कीट-पतंगे ताज पर बैठते हैं. इन्हीं कीट-पतंगों की वजह से ताज महल का संग-ए-मरमर बदरंग हो रहा है. इसमें एक ख़ास किस्म के कीड़े की पहचान भी की गई है जो गंदे नाले से उड़कर संग-ए-मरमर पर बैठता है और उसका रंग हरा कर देता है.
ताज महल की दीवार से ठीक लगा हुआ है एक श्मशान जहां औसतन हर रोज़ 20 शवों को जलाया जाता है. उसका धुंआ भी सीधे तौर पर ताज महल की मुख्य इमारत से टकराता है.
पुरातत्वविद कहते हैं कि ताज महल की नींव 180 कुँओं और लकड़ी के चबूतरों पर टिकी है जिसे पूरे साल पानी चाहिए. सिर्फ ताज महल के गुम्बद का वज़न 12,500 टन बताया जाता है. इसका मतलब है की इमारत की नींव को हमेशा मज़बूत रहना होगा.
खंडेलवाल कहते हैं, ”जब 12,500 टन सिर्फ गुम्बद का वज़न है तो बाक़ी की इमारत के वज़न का अंदाजा लगाया जा सकता है. इतनी वज़नदार इमारत की नीव भी उतनी ही मज़बूत रहनी चाहिए.”
इतिहासकार प्रोफेसर रामनाथ अपनी किताब में लिखते हैं कि मुग़लों की ज़्यादातर इमारतों को अगर देखा जाए तो वो बाग़ के बीच-ओ-बीच हैं. मगर ताज महल सिर्फ ऐसी इमारत है जिसे बाग़ के एक कोने में बनाया गया है. वो भी उस कोने पर जो यमुना का किनारा है. ये इसलिए ताकि ताज महल में कुओं और साल की लड़की की नींव को बारहों महीने पानी मिलता रहे.
अगर ताज महल की नींव को पानी नहीं मिला तो नीचे की लकड़ी सूख जायेगी और मुहब्बत की निशानी के दरक जाने की आशंका बढ़ जाएगी.
पर्यावरणविद्द एम सी मेहता ने जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है उसमे कहा गया है कि वायु प्रदूषण और यमुना के सूखने, उसमे औद्योगिक और घरेलू कूड़ा फेंके जाने की वजह से ताज महल की नींव कमज़ोर होती जा रही है. 7वीं सदी में 'नेशनल हाइवे' नहीं होने की वजह से ज़्यादातर कारोबार और सफ़र नदी के माध्यम से होता था. इस लिए आगरा को ‘सिटी ऑफ़ वेनिस’ भी कहा जाता था. मगर जैसे-जैसे आबादी बढती चली गई और उद्योग पनपे, यमुना पर डैम और बराज बन गए. हरियाणा का हथनीकुंड और मथुरा इसके उदाहरण हैं.
दिल्ली से लेकर आगरा तक हज़ारों उद्योगों और कल-कारखानों का कचरा सीधे यमुना में बहकर आता है और फिर वो ताज महल के आस पास आकर ठहर जाता है.
बृज अगरवाल कहते हैं कि अगर ताज महल को बचाना है तो यमुना को बचाना होगा और उसे अपने पुराने रूप में लाना होगा– यानी ताज महल को भी उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए यमुना से और इसके लिए उसका कोटा निर्धारित किया जाना चाहिए. ज खंडेलवाल कहते हैं: "रेगिस्तान तेज़ी से आगरा की तरफ़ राजस्थान से बढ़ रहा है. रेतीली आंधी ताज महल के संग-ए-मरमर को नुकसान पहुंचा रही है, उसे खुरदुरा बना रही है. यमुना के गंदे पानी के कीड़े उड़कर ताज महल पर जा बैठते हैं. इन कीड़ों के मल की वजह से ताज महल बदरंग हो रहा है. रेतीली आंधी को रोका जा सकता है. रेगिस्तान को आगरा की तरफ बढ़ने से रोका जा सकता है. इसके लिए चाहिए घने पेड़ों की दीवारें. ये कोई आज की बात नहीं है. पिछले कुछ सालों में अगर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया होता तो आज रेतीली आंधी ताज महल तक नहीं जा पाती. उसे पेड़ रोक लेते. मगर ऐसा नहीं किया गया."
ताज महल पर प्रदूषण की मार की वजह से जिन पत्थरों का नुकसान हुआ या जो दरारें पड़ीं उनकी मरम्मत का ज़िम्मा भारतीय पुरातत्व विभाग का है. ये काम भी कई दशकों से चलता आ रहा है. विभाग के सेवानिवृत अधिकारी आरके दीक्षित कहते हैं कि ताज के वास्तविक रंग को बहाल करने के लिए रासायनिक उपचार किया गया. इसके तहत पूरी इमारत पर एक ख़ास तरह का रासायनिक लेप लगाया गया जिससे प्रदूषण का असर कम हो और इमारत में चमक फिर से लौट आए.
मगर पर्यावरणविदों के विरोध के बाद इसे बंद करना पड़ा. पर्यावरण वैज्ञानिकों का दावा है कि रासायनिक लेप की वजह से ताज महल को ज़्यादा नुकसान हुआ है और उसका रंग पहले से भी ज़्यादा पीला पड़ने लगा.
इसका दूसरा कारण वो बताते हैं ज़्यादा सैलानियों का आना. ज्यादा सैलानियों की वजह से उमस भी ज़्यादा होती है जिसका असर पत्थरों पर पड़ता है.
रासायनिक लेप के विरोध के बाद अब पुरातत्व विभाग मिट्टी का लेप लगा रहा है मगर पर्यावरणविद इससे भी खुश नहीं हैं. उनका मानना है कि मिटटी का लेप संग-ए-मरमर को और भी खुरदुरा बना रहा है जिससे नुकसान हो रहा है. संग-ए-मरमर राजस्थान से आने वाली धूल भरी आंधी को झेल नहीं पा रहा है.
रेगिस्तान तेज़ी से आगरा की तरफ बढ़ रहा है. उसके रोकने का एक ही उपाय है पूरे शहर को घने पेड़ों से घेरना.
आगरा के आयुक्त के मोहन राव को सुप्रीम कोर्ट ने ताज महल और आगरा के धरोहरों को बचाने का ज़िम्मा सौंपा है. वो समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट में अपने रिपोर्ट पेश करते हैं. वो ताज ट्रेपेजियम जोन के भी अध्यक्ष हैं.

Monday, September 10, 2018

गठबंधन में हुए हैं कई फेरबदल

इस मसले पर सवर्णों में अच्छी-खासी नाराज़गी बताई जा रही है. यह बात जगजाहिर है कि यह वर्ग भाजपा का कोर वोटर है. अब इसके दो पक्ष हैं. एक कि यह वर्ग भाजपा से ही नहीं सभी राजनीतिक दलों से नाराज़ है.
यही बात भाजपा के लिए उम्मीद की किरण है. क्योंकि नाराजगी के बावजूद उसने किसी और राजनीतिक दल के साथ जाने का फ़ैसला नहीं किया है. दूसरी बात यह कि सवर्ण जितनी ज्यादा नाराजगी दिखाएगा, भाजपा के लिए दलितों को समझाने में उतनी ही आसानी होगी कि उसके भले के लिए पार्टी ने सवर्णों की नाराजगी मोल ली. पर यह तलवार की धार पर चलने जैसा है.
पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम सरकार के लिए चुनावी सरदर्द बन रहे हैं. इस मुद्दे पर मोदी सरकार ने राजनीतिक फ़ायदे के नज़रिए से कदम उठाने की बजाय आर्थिक दृष्टि से व्यवहारिक कदम उठाया है.
सरकार ने न तो सब्सिडी देने का फैसला किया है और न ही केंद्रीय करों में कटौती का. पर सवाल है कि कब तक? नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम में विधानसभा चुनाव हैं.
उसके बाद लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो जाएगी. ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी की तरह आखिरी ओवर में मैच जीतना चाहते हैं. हम सब जानते हैं कि इस रणनीति के कामयाब और नाकाम होने की संभावना बराबर-बराबर होती है. ऐसे मौके पर नेता या बल्लेबाज़ की क्षमता से ज्यादा बड़ी भूमिका उसके आत्मविश्वास की होती है.
पिछले लोकसभा चुनाव में जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन था उसका स्वरूप बदल रहा है. आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू बाहर चले गए हैं. बिहार में जीतन राम मांझी पहले ही जा चुके हैं. तो उपेन्द्र कुशवाहा का एक पैर अंदर और एक बाहर है. शिवसेना पिछले चार साल से 'तुम्हीं से मुहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई' का खेल खेलते-खेलते कुछ ज्यादा दूर निकल गई है.
शिवसेना के भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की उतनी ही संभावना है जितनी कि उद्धव ठाकरे के गठबंधन का मुख्यमंत्री बनने की. बिहार में नीतीश कुमार मन नहीं बना पा रहे हैं कि वे अपने को पटना तक महदूद रखें या दिल्ली का भी टिकट खरीद लें. इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है.
कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू के दुश्मन भाजपा और तेलंगाना राष्ट्र समिति एक-दूसरे को दोस्ती का पैगाम भेज रहे हैं. याद रहे चंद्रशेखर राव भाजपा के ख़िलाफ़ संभावित फेडरल फ्रंट के दूल्हा बनने वाले थे. ओडिशा में भाजपा ने मान लिया लगता है कि नवीन पटनायक को अपदस्थ करना इस चुनाव में तो संभव नहीं है. तो नवीन पटनायक ने भी मान लिया है कि नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के दिनों की दोस्ती को बनाए रखने में कोई हर्ज़ नहीं है.
तमिलनाडु की राजनीति इतनी उलझी हुई शायद ही कभी रही हो. पर इतिहास गवाह है कि वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अधिकांशत: केंद्र में सत्तारूढ़ दल के साथ रहती है. जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती रास्ते के स्टेशन से एनडीए की ट्रेन पर सवार हुई थीं और गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही उतर गईं या उतार दी गईं.
रोज़गार का मुद्दा नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल का सबब बना हुआ है. विपक्ष बार-बार इसी पर वार कर रहा है. भ्रष्टाचार के आरोप में पूरे देश में सिकुड़ रही कांग्रेस, रफ़ाएल लड़ाकू विमान सौदे के जरिए भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने का प्रयास कर रही है, पर कितनी सफल होगी कहना मुश्किल है. उसके सामने रफ़ाएल से बड़ा मुद्दा विपक्ष की एकता और राहुल गांधी के नेतृत्व के प्रति विपक्षी दलों की बेरुखी का है.
लोकसभा चुनाव के नज़रिए से सबसे बड़ा सवाल है कि क्या विपक्ष एक हो पाएगा? और एक हुआ तो उसका नेता कौन होगा.
बाद में नेता चुनने वाली राजनीति का समय पीछे छूट गया है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना है कि सब मिलकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को हरा दें तो मोदी को रोका जा सकता है. सवाल है कि क्या मायावती इसके लिए तैयार हैं. शुरुआती उत्साह के बाद वे अब बहुत उत्सुक नहीं दिख रहीं.
ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिनपर भारतीय जनता पार्टी की दो दिन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में विचार होगा. पार्टी के सामने समस्याएं हैं तो उपलब्धियां भी हैं. उज्ज्वला, जनधन, बीमा योजना, शौचालय, प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य. फसल बीमा योजना, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी और दूसरी केंद्रीय योजनाओं की उपलब्धियां हैं.
कार्यकारणी की बैठक में इन योजनाओं के लाभार्थियों से पार्टी को जोड़ने की रणनीति तय होगी. सभी मुख्यमंत्रियों/उप मुख्यमंत्रियों से कहा गया है कि वे अपने प्रदेश के ऐसे लाभार्थियों की सूची लेकर आएं.
इस सूची को बूथवार बांटकर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी. इन सबके अलावा भाजपा के पास मोदी के रूप में तुरप का पत्ता है. अपने वादों पर पूरी तरह खरा न उतर पाने के बावजूद मोदी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता में ज्यादा कमी नहीं आई है. सोने पर सुहागा यह है कि चुनावी युद्ध के मैदान में सामने नेतृत्वहीन और बिखरा हुआ विपक्ष है.

Tuesday, September 4, 2018

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब निकाय चुनाव में के साथ क्या हुआ?

लाश नाथ शुक्ल के मुताबिक गांववालों को लग रहा था कि वो अपनी बीमार गाय को छोड़ने जा रहे थे. हालांकि कैलाश ने भीड़ को सफाई दी कि वो गाय को छोड़ने नहीं, उसका इलाज़ करवाने जा रहे हैं. लेकिन भीड़ ने उनकी बात नहीं मानी. इसी बीच भीड़ में से किसी ने कह दिया कि कैलाश अपनी गाय को गांव के ही एक मुस्लिम को बेचने के लिए लेकर जा रहे हैं. इसके बाद तो भीड़ और भी उग्र हो गई और कैलाश की पिटाई शुरू कर दी. पिटाई से कैलाश का हाथ टूट गया है. डॉक्टरों ने उनके दाहिने हाथ पर प्लास्टर चढ़ा रखा है. वहीं कैलाश का आरोप है कि पिटाई के बाद जब वो देहात कोतवाली पहुंचे, तो पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया. जब पूरे घटनाक्रम की जानकारी एसपी राजेश कुमार को दी गई, तो उनके आदेश पर केस दर्ज हो पाया. इसके बाद एसपी राजेश कुमार के आदेश पर आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है. इसके अलावा एसपी राजेश कुमार ने उन पुलिसवालों के खिलाफ जांच भी शुरू कर दी है, जिन्होंने कैलाश शुक्ल का मुकदमा दर्ज करने से इन्कार कर दिया था.भले ही बलरामपुर पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्
शहरी निकाय के इन चुनावों में कुल 8340 उम्मीदवार मैदान में थे. इसमें कांग्रेस के 2306, भाजपा के 2203 और जेडी-एस के 1397 उम्मीदवार थे. वहीं शहर निगम चुनावों में 814 उम्मीदवार हैं. इसमें कांग्रेस के 135, भाजपा के 130 और जेडी-एस के 129 उम्मीदवार हैं.
तार कर लिया है, लेकिन ये भीड़ है. भीड़ बच्चा चोरी पर भी न्याय करने लगी है, भीड़ मोबाइल चोरी पर भी न्याय करने लगी है, भीड़ गोकशी पर भी न्याय करने लगी है. पहले ये भीड़ मुस्लिमों को निशाना बना रही थी, तो लोग उन्हें गोतस्कर करार दे रहे थे. भीड़ दलितों को निशाना बना रही थी, तो उन्हें भी गोतस्कर कह दिया जाता था, लेकिन अब जब इस भीड़ के हाथ में मुस्लिम नहीं आ रहा, दलित नहीं आ रहा तो ये भीड़ खाली बैठी है. उसे निशाना चाहिए ही चाहिए. और अब निशाना 70 साल के कैलाश नाथ शुक्ल बने हैं. अगर भीड़ ऐसे ही अराजक होती रही, तो अगला निशाना हम आप कोई भी हो सकते हैं और हमें आपको निशाने पर लेने के लिए भीड़ के पास कोई न कोई नया बहाना मिल ही जाएगा.मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आया था. बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी. पर वो सरकार बनाते-बनाते रह गई. मिठाई एकदम मुंह में आते-आते रह गई. अब इसी कर्नाटक से फिर भारतीय जनता पार्टी के लिए बुरी खबर आई है. 31 अगस्त को कर्नाटक में 105 निकाय सीटों के 2664 वार्डों पर चुनाव हुए थे. 3 सितंबर को उसके रिजल्ट भी आ गए हैं. यहां भी बीजेपी पिछड़ गई है. कांग्रेस और जेडी-एस ने यहां भी बाजी मार ली है. हालांकि कांग्रेस और जेडी-एस अलग-अलग लड़े थे. अब तक 2664 वार्ड के नतीजे आए हैं. इसमें कांग्रेस ने 982, बीजेपी ने 929 और जेडी-एस ने 375 सीटों पर जीत दर्ज की है.
र्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने इस चुनाव में एक तरह से हार स्वीकार कर ली है. उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार की वजह से पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई. हालांकि वो ये जरूर बोले कि 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी बेहतर प्रदर्शन करेगी. येदियुरप्पा ने चुनाव से पहले 50 से 60 फीसदी सीटों पर बीजेपी की जीत का दावा किया था.
अलग-अलग चुनाव लड़े कांग्रेस और जेडीएस
कांग्रेस और जेडी-एस आए नतीजों से भी ज्यादा सीटें ला सकते थे, अगर दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ते. हालांकि अब माना जा रहा है कि चुनाव बाद दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव के लिए फिर साथ आ सकती हैं. पिछली बार 2013 में 4976 सीटों के लिए चुनाव हुए थे. तब कांग्रेस ने 1,960 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं, जेडीएस ने 905 और भाजपा ने भी 905 सीटों जीत हासिल की थी. हालांकि इस लिहाज से इस बार जेडी-एस का नुकसान हुआ है. सीएम एचडी कुमारस्वामी के लिए ये अच्छी खबर नहीं है.
कर्नाटक निकाय चुनावों से ही एक और खबर आ रही है. यहां पड़ने वाले तुमकुर में कांग्रेस उम्मीदवार के विजय जुलूस पर कुछ अज्ञात हमलावरों ने तेजाब फेंक दिया. इसमें करीब 25 लोग घायल हुए हैं. पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है. हालांकि अभी ये नहीं साफ हो सका है कि हमलावर कौन थे.