इस मसले पर सवर्णों में अच्छी
-खासी नाराज़गी बताई जा रही है. यह बात
जगजाहिर है कि यह वर्ग भाजपा का कोर वोटर है. अब इसके दो पक्ष हैं. एक कि
यह वर्ग भाजपा से ही नहीं सभी राजनीतिक दलों से नाराज़ है.
यही बात
भाजपा के लिए उम्मीद की किरण है. क्योंकि नाराजगी के बावजूद उसने किसी और
राजनीतिक दल के साथ जाने का फ़ैसला नहीं किया है. दूसरी बात यह कि सवर्ण
जितनी ज्यादा नाराजगी दिखाएगा, भाजपा के लिए दलितों को समझाने में उतनी ही
आसानी होगी कि उसके भले के लिए पार्टी ने सवर्णों की नाराजगी मोल ली. पर यह
तलवार की धार पर चलने जैसा है.
पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम सरकार के लिए चुनावी सरदर्द बन रहे हैं.
इस मुद्दे पर मोदी सरकार ने राजनीतिक फ़ायदे के नज़रिए से कदम उठाने की
बजाय आर्थिक दृष्टि से व्यवहारिक कदम उठाया है.
सरकार ने न तो
सब्सिडी देने का फैसला किया है और न ही केंद्रीय करों में कटौती का. पर
सवाल है कि कब तक? नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश
, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम में विधानसभा चुनाव हैं.
उसके बाद
लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो जाएगी. ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी कहीं क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी की तरह आखिरी ओवर में मैच
जीतना चाहते हैं. हम सब जानते हैं कि इस रणनीति के कामयाब और नाकाम होने की
संभावना बराबर-बराबर होती है. ऐसे मौके पर नेता या बल्लेबाज़ की क्षमता से
ज्यादा बड़ी भूमिका उसके आत्मविश्वास की होती है.
पिछले लोकसभा चुनाव में जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन था उसका स्वरूप
बदल रहा है. आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू बाहर चले गए हैं. बिहार में
जीतन राम मांझी पहले ही जा चुके हैं. तो उपेन्द्र कुशवाहा का एक पैर अंदर
और एक बाहर है. शिवसेना पिछले चार साल से 'तुम्हीं से मुहब्बत, तुम्हीं से
लड़ाई' का खेल खेलते-खेलते कुछ ज्यादा दूर निकल गई है.
शिवसेना के भाजपा के साथ मिलकर चुनाव ल
ड़ने की उतनी ही संभावना है जितनी
कि उद्धव ठाकरे के गठबंधन का मुख्यमंत्री बनने की. बिहार में नीतीश कुमार
मन नहीं बना पा रहे हैं कि वे अपने को पटना तक महदूद रखें या दिल्ली का भी
टिकट खरीद लें. इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है.
कांग्रेस और
चंद्रबाबू नायडू के दुश्मन भाजपा और तेलंगाना राष्ट्र समिति एक-दूसरे को
दोस्ती का पैगाम भेज रहे हैं. याद रहे चंद्रशेखर राव भाजपा के ख़िलाफ़
संभावित फेडरल फ्रंट के दूल्हा बनने वाले थे. ओडिशा में भाजपा ने मान लिया
लगता है कि नवीन पटनायक को अपदस्थ करना इस चुनाव में तो संभव नहीं है. तो
नवीन पटनायक ने भी मान लिया है कि नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के दिनों
की दोस्ती को बनाए रखने में कोई हर्ज़ नहीं है.
तमिलना
डु की राजनीति इतनी उलझी हुई शायद ही कभी रही हो. पर इतिहास गवाह
है कि वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अधिकांशत: केंद्र में सत्तारूढ़ दल के साथ
रहती है. जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती रास्ते के स्टेशन से एनडीए की
ट्रेन पर सवार हुई थीं और गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही उतर गईं या उतार दी
गईं.
रोज़गार का मुद्दा नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए सबसे ज्यादा
मुश्किल का सबब बना हुआ है. विपक्ष बार-बार इसी पर वार कर रहा है.
भ्रष्टाचार के आरोप में पूरे देश में सिकुड़ रही कांग्रेस, रफ़ाएल लड़ाकू
विमान सौदे के जरिए भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने का प्रयास कर रही है, पर
कितनी सफल होगी कहना मुश्किल है. उसके सामने रफ़ाएल से बड़ा मुद्दा विपक्ष
की एकता और राहुल गांधी के नेतृत्व के प्रति विपक्षी दलों की बेरुखी का है.
लोकसभा चुनाव के नज़रिए से सबसे बड़ा
सवाल है कि क्या विपक्ष एक हो पाएगा? और एक हुआ तो उसका नेता कौन होगा.
बाद
में नेता चुनने वाली राजनीति का समय पीछे छूट गया है. पश्चिम बंगाल की
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना है कि सब मिलकर उत्तर प्रदेश में भाजपा
को हरा दें तो मोदी को रोका जा सकता है. सवाल है कि क्या मायावती इसके लिए
तैयार हैं. शुरुआती उत्साह के बाद वे अब बहुत उत्सुक नहीं दिख रहीं.
ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिनपर भारतीय जनता पार्टी की दो दिन की राष्ट्रीय
कार्यकारिणी की बैठक में विचार होगा. पार्टी के सामने समस्याएं हैं तो
उपलब्धियां भी हैं. उज्ज्वला, जनधन, बीमा योजना, शौचालय, प्रधानमंत्री आवास
योजना, सौभाग्य. फसल बीमा योज
ना, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में
बढ़ोतरी और दूसरी केंद्रीय योजनाओं की उपलब्धियां हैं.
कार्यकारणी
की बैठक में इन योजनाओं के लाभार्थियों से पार्टी को जोड़ने की रणनीति तय
होगी. सभी मुख्यमंत्रियों/उप मुख्यमंत्रियों से कहा गया है कि वे अपने
प्रदेश के ऐसे लाभार्थियों की सूची लेकर आएं.
इस सूची को बूथवार
बांटकर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी. इन सबके अलावा भाजपा के पास
मोदी के रूप में तुरप का पत्ता है. अपने वादों पर पूरी तरह खरा न उतर पाने
के बावजूद मोदी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता में
ज्यादा कमी नहीं आई है.
सोने पर सुहागा यह है कि चुनावी युद्ध के मैदान में सामने नेतृत्वहीन और
बिखरा हुआ विपक्ष है.