Thursday, December 20, 2018

ثمانية أسباب قد تجعلك تستمتع بتناول طعامك وحدك

ليس كل شخص يحب أن يتناول الطعام بمفرده.
بعض الناس يجدون ذلك الأمر مملا، بينما يشعر آخرون بالخجل أو القلق، لدرجة قد تجعلهم يأجلون تناول الطعام تماما، حتى يصبحوا بمفردهم.
شيلا ديلون مراسلة برنامج الطعام، الذي يذاع على راديو "بي بي سي 4"، توصلت إلى ثمانية أسباب، قد تجعل تناولك الطعام بمفردك شيئا جيدا.

1: يمكنك تناول أي طعام تحبه.

تناول الطعام بمفردك يجعلك حرا، في اختيار الطعام الذي تأكله، دون الأخذ في الاعتبار تفضيلات الآخرين.
فربما كنت تحب طعاما ذا رائحة نفاذة، لا يتحملها آخرون، وربما كنت من عاشقي الكربوهيدرات، وتخجل من ابتلاع طبق من البطاطس، أو سلطانية من المكرونة، داخل الشركة التي تعمل بها.

2: لن تضطر إلى أن يشاركك الأخرون طعامك.

هل جربت ذات مرة أن تطلب الطبق اللذيذ، الذي ربما كنت تحلم به منذ شهور، لتجد أصدقاءك يرغبون في تجريبه، ويتركون لك فقط الملعقة الأخيرة منه؟
قد يكون تناول الطعام بمفردك أكثر هدوءا، ويوفر لك فرصة لتناول وجبتك بالكامل، دون أن تترك منها الفتات.

3: ربما يسهل عليك هذا الأمر الحفاظ على نظام غذائي صحي.

إذا كنت تحاول اتباع نظام غذائي صحي، فإن تناول طعامك بمفردك ربما يعني فرصة أكبر، للالتزام بهذا النظام.
وأفادت دراسة، مقدمة لجمعية القلب الأمريكية، بأن متبعي الأنظمة الغذائية يواجهون احتمالا بنسبة 60 في المئة، للتخلي عن أنظمتهم، حينما يأكلون برفقة آخرين.
وأشارت دراسة، أعدها طبيب نفسي في جامعة ولاية جورجيا الأمريكية، إلى أن الأكل الجماعي يتسبب في أن يأكل الأشخاص كميات أكبر بنسبة 44 في المئة، بما في ذلك كميات أكبر من الدهون.

4: يمكنك أن تأكل حسب سرعتك.

تشير الأبحاث إلى أننا عموما نضبط طريقتنا في الأكل، لتعكس سلوك الشخص الذي برفقتنا.
وكشفت إحدى الدراسات أنه في حال تناول امرأتين شابتين للطعام معا، فإنهما ستميلان إلى التزامن في أكلهما، إلى درجة أن كل منهما قد تتناول قضمة من الطعام، بعد الأخرى مباشرة.
الأسر التي تتكون من شخص واحد هي الأسرع نموا، من بين التركيبة السكانية عالميا، ويعيش نحو 300 مليون شخص بمفردهم حول العالم، وذلك وفقا لأرقام الأمم المتحدة ومنظمات أخرى.
وحتى إذا كنت تعيش برفقة آخرين، تشير التقديرات إلى أن نحو نصف وجبات الطعام للبالغين، يتناولها أشخاص بمفردهم.
إذن ما دام من المرجح أن ينتهي بك الأمر إلى تناول طعامك بمفردك، فمن الأفضل أن نتقبل الأمر بسرور.

Monday, November 12, 2018

थुरा को तीर्थ स्थल घोषित कर यहां मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगायेगी योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार राम की नगरी अयोध्या और कृष्ण की नगरी मथुरा को तीर्थ स्थान घोषित कर वहां मांस-मदिरा की बिक्री तथा सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है । 
उप्र सरकार के प्रवक्ता और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने सोमवार को 'भाषा' से विशेष बातचीत में कहा 'साधु संतों और करोड़ों भक्तों की मांग थी कि राम और कृष्ण की नगरी में मांस-मदिरा की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया जाये ।

उनकी मांग का सम्मान करते हुये प्रदेश सरकार अयोध्या की चौदह कोसी परिक्रमा के आसपास के इलाके और मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के आसपास के इलाके को तीर्थ स्थान घोषित करने की योजना पर काम कर रही है। जब ये दोनों स्थान तीर्थ स्थान घोषित हो जायेंगे तो यहां स्वत: ही मांस-मदिरा की बिक्री पर प्रतिबंध लग जायेगा । बिना तीर्थ स्थान घोषित किये इन दोनों स्थानों पर मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगाना संभव नही है ।'
 
उन्होंने कहा 'अयोध्या और मथुरा में मांस-मदिरा पर प्रतिबंध की मांग को सरकार ने गंभीरता से लिया है और इन दोनों जगहों को तीर्थ स्थान घोषित करने की योजना पर काम किया जा रहा है।’’ ऊर्जा मंत्री ने कहा कि अयोध्या में चौदह कोसी परिक्रमा का इलाका, मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के आसपास के इलाके को तीर्थ स्थान घोषित कर यहां पर मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगाये जाने की योजना है । 

शर्मा के मुताबिक, मथुरा में वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गिरिराज जी :गोर्वधन: की सप्त कोषी परिक्रमा का इलाका पहले से ही तीर्थस्थान घोषित है और वहां मांस-मदिरा की बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबंध है ।

गौरतलब है कि छह नवंबर को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया है। संतों ने मांग की थी कि अयोध्या में मांस-मदिरा की बिक्री भगवान राम का अपमान है और इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। रकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार 36 राफेल विमानों की खरीद के संबंध में किये गए फैसले के ब्योरे वाले दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंप दिए हैं। दस्तावेजों में कहा गया है कि राफेल विमानों की खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है। दस्तावेजों में कहा गया है कि विमान के लिए रक्षा खरीद परिषद की मंजूरी ली गई थी। भारतीय दल ने फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत भी की। दस्तावेजों में कहा गया है कि सौदा नियमों के मुताबिक हुआ। जिसके लिए 74 बैठकें हुई थीं। दस्तावेजों में कहा गया कि फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत तकरीबन एक साल तक चली और समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले मंत्रीमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की मंजूरी ली गई।

इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने राफेल सौदे की निर्णय प्रक्रिया का पूरा विवरण प्रस्तुत किया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की बेंच ने केंद्र से निर्णय लेने की प्रक्रिया से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी थी। बता दें राफेल सौदे में लड़ाकू विमान की कीमतों को लेकर विपक्षी पार्टियां शुरू से ही केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगा रही हैं।

मामले की सुनवाई सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच कर रही है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि वह डिफेंस फोर्सेज के लिए राफेल विमानों की उपयुक्तता पर कोई राय नहीं देना चाहते और न ही कोई नोटिस जारी कर रहे हैं। कोर्ट केवल फैसला लेने की प्रक्रिया की वैधता जानना चाहता है।

इस सौदे का विरोध कर रही मुख्य विपक्षी पार्टी का कहना है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से विमान खरीद रही है जबकि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान इसकी कीमत 526 करोड़ रुपये तय हुई थी।

Wednesday, October 10, 2018

投资者加大对电力企业气候变化应对措施审查力度

力企业——生产和提供电力的公司——是否已经准备好迎接气候变化相关政策和行动带来的各种变化?如果没有,那我们为什么要严肃看待这件事情?

我们大多数人的养老金都或多或少与电力公司相关。2007年到2008年期间,欧盟地区2020年气候与能源框架协议正式通过,该协议将极大提高可再生能源的使用比例。在此之前,欧洲的电力企业业绩表现都不错,而协议通过之后,这些公司就开始走下坡路了。

包括可再生能源比例上升等多种原因导致电力部门日益分散化,从而导致天然气和燃煤电厂这样的资本密集型基础设施建设的性价比也越来越低,并进而为那些继续严重依赖煤炭能源的大型电厂带来重重风险。

巴黎气候协议于去年12月正式通过,目前已经有177个国家签署了这份协议。该协议有望加快全球发电与配电产业结构的转型升级。

为了达到这个目标,我们必须告别对化石燃料的依赖,以低碳能源作为未来经济发展的基础,实现全球经济的大转型。

中国是首批签署巴黎气候协议的国家之一,同时也正逐渐成为落实协议内容、实现“低碳转型”的重要推动力量。

比如,截至2016年4月的一年间,中国新增太阳能装机达710万千瓦——相当于将中国的太阳能光伏发电能力提升了将近整整一倍。

中国计划在2030年前将低碳能源消费比例提升到20%左右——也就是将中国的低碳能源装机再增加8-10亿千瓦,甚至超过了中国现有的燃煤装机总量。

华北电力大学的一项最新研究(覆盖中国燃煤发电最集中的6个省份)显示,中国的煤炭产业在未来几年内将变得无利可图。这也从某种程度上解释了,为什么最近中国决定停建近200座燃煤发电厂(发电能力约为1.05亿千瓦)。

投资者对于低碳转型挑战传统电力企业的做法予以认可。因为投资者明白,电力企业的商业策略与资本配置将直接影响到未来几十年企业的可持续性和盈利能力。

因此,越来越多的投资者,尤其是各种养老基金,都希望电力企业能够积极做好准备,充分利用好低碳转型这个机遇。

所以,今年4月29日,由四大组织(包括气候变化亚洲投资者集团)所组成的全球网络发布了一份电力公共事业企业应对气候风险的指导文件。该网络代表了全球270多家机构投资者,资产总额超过20万亿欧元(约合148万亿人民币)。

该文件对未来行业管理提出了6点关键希望,其中包括:行业透明度;信息披露;商业策略(包括开展模拟或‘压力测试’,研究在国家为了落实巴黎气候条约而出台相应法规与公共条例的情况下,企业如何开展经营活动);运营效率;去碳化(企业摆脱化石燃料的过程);以及提高新技术的使用与整合水平,造福居民日常生活和整体环境健康。

同时,投资者还提醒电力企业应告诉消费者(通过节能手段)到底帮他们节约了多少度电,以及这些能源在整体电力销售中的占比。

任何简单的方法都不足以衡量消费者的总体满意度,如今这种趋势更是越加明显。那些声称已经采取了气候变化应对措施的电力企业必须要向消费者做出详尽解释,比如为了与太阳能企业建立全新伙伴关系他们正在做(或没有做)什么,以及在开发“智能电网”和能源储存解决方案方面投入了多少资金等。

此外,投资者希望电力企业不仅能够说明到底有多少消费者正在使用智能电表,而且还想知道这种新技术到底给消费者带来了多大的好处。


免费下载《投资者对电力企业的期望:细数煤炭资产风险》

Friday, September 14, 2018

आदेश को अब 18 साल हो गए हैं मगर आगरा और ता

सुप्रीम कोर्ट के 1996 के आदेश को अब 18 साल हो गए हैं मगर आगरा और ताज महल के आसपास प्रदूषण की मात्रा गंभीर रूप धारण करती चली गयी. बीबीसी से बात करते हुए मेहता ने अफ़सोस जताया कि सुप्रीम कोर्ट के  के आदेश से ही काफी कुछ बदल सकता था. मगर ऐसा नहीं हुआ और उन्हें फिर से अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा.
वहीं पर्यावरणविदों ने यमुना को ही प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत माना. पर्यावरणविद बृज खंडेलवाल एक लंबे अरसे से यमुना के प्रदूषण को लेकर आवाज़ उठाते रहे हैं.
आगरा में आते-आते यमुना एक नाले का रूप धारण कर लेती है. इसका पानी रुक जाता है और दिल्ली से लेकर आगरा तक नदी के किनारे बने उद्योग अपना कचरा सीधे यमुना में डालते रहे हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, आगरा शहर के सभी नाले, जिनकी संख्या 90 के आस पास है, सीधे बिना किसी तरह के 'ट्रीटमेंट' के यमुना में आकर गिरते हैं.
बीबीसी से बातचीत में खंडेलवाल ने कहा, चूँकि यमुना सूख रही है इसलिए धूल के कण हवा की वजह से सीधे ताज महल पर जाकर गिरते हैं. इसके अलावा शहर भर का कचरा भी यमुना के किनारे ही डाल दिया जाता है जिस कारण मक्खी, मच्छरऔर दूसरे कीट-पतंगे ताज पर बैठते हैं. इन्हीं कीट-पतंगों की वजह से ताज महल का संग-ए-मरमर बदरंग हो रहा है. इसमें एक ख़ास किस्म के कीड़े की पहचान भी की गई है जो गंदे नाले से उड़कर संग-ए-मरमर पर बैठता है और उसका रंग हरा कर देता है.
ताज महल की दीवार से ठीक लगा हुआ है एक श्मशान जहां औसतन हर रोज़ 20 शवों को जलाया जाता है. उसका धुंआ भी सीधे तौर पर ताज महल की मुख्य इमारत से टकराता है.
पुरातत्वविद कहते हैं कि ताज महल की नींव 180 कुँओं और लकड़ी के चबूतरों पर टिकी है जिसे पूरे साल पानी चाहिए. सिर्फ ताज महल के गुम्बद का वज़न 12,500 टन बताया जाता है. इसका मतलब है की इमारत की नींव को हमेशा मज़बूत रहना होगा.
खंडेलवाल कहते हैं, ”जब 12,500 टन सिर्फ गुम्बद का वज़न है तो बाक़ी की इमारत के वज़न का अंदाजा लगाया जा सकता है. इतनी वज़नदार इमारत की नीव भी उतनी ही मज़बूत रहनी चाहिए.”
इतिहासकार प्रोफेसर रामनाथ अपनी किताब में लिखते हैं कि मुग़लों की ज़्यादातर इमारतों को अगर देखा जाए तो वो बाग़ के बीच-ओ-बीच हैं. मगर ताज महल सिर्फ ऐसी इमारत है जिसे बाग़ के एक कोने में बनाया गया है. वो भी उस कोने पर जो यमुना का किनारा है. ये इसलिए ताकि ताज महल में कुओं और साल की लड़की की नींव को बारहों महीने पानी मिलता रहे.
अगर ताज महल की नींव को पानी नहीं मिला तो नीचे की लकड़ी सूख जायेगी और मुहब्बत की निशानी के दरक जाने की आशंका बढ़ जाएगी.
पर्यावरणविद्द एम सी मेहता ने जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है उसमे कहा गया है कि वायु प्रदूषण और यमुना के सूखने, उसमे औद्योगिक और घरेलू कूड़ा फेंके जाने की वजह से ताज महल की नींव कमज़ोर होती जा रही है. 7वीं सदी में 'नेशनल हाइवे' नहीं होने की वजह से ज़्यादातर कारोबार और सफ़र नदी के माध्यम से होता था. इस लिए आगरा को ‘सिटी ऑफ़ वेनिस’ भी कहा जाता था. मगर जैसे-जैसे आबादी बढती चली गई और उद्योग पनपे, यमुना पर डैम और बराज बन गए. हरियाणा का हथनीकुंड और मथुरा इसके उदाहरण हैं.
दिल्ली से लेकर आगरा तक हज़ारों उद्योगों और कल-कारखानों का कचरा सीधे यमुना में बहकर आता है और फिर वो ताज महल के आस पास आकर ठहर जाता है.
बृज अगरवाल कहते हैं कि अगर ताज महल को बचाना है तो यमुना को बचाना होगा और उसे अपने पुराने रूप में लाना होगा– यानी ताज महल को भी उसके हिस्से का पानी मिलना चाहिए यमुना से और इसके लिए उसका कोटा निर्धारित किया जाना चाहिए. ज खंडेलवाल कहते हैं: "रेगिस्तान तेज़ी से आगरा की तरफ़ राजस्थान से बढ़ रहा है. रेतीली आंधी ताज महल के संग-ए-मरमर को नुकसान पहुंचा रही है, उसे खुरदुरा बना रही है. यमुना के गंदे पानी के कीड़े उड़कर ताज महल पर जा बैठते हैं. इन कीड़ों के मल की वजह से ताज महल बदरंग हो रहा है. रेतीली आंधी को रोका जा सकता है. रेगिस्तान को आगरा की तरफ बढ़ने से रोका जा सकता है. इसके लिए चाहिए घने पेड़ों की दीवारें. ये कोई आज की बात नहीं है. पिछले कुछ सालों में अगर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया होता तो आज रेतीली आंधी ताज महल तक नहीं जा पाती. उसे पेड़ रोक लेते. मगर ऐसा नहीं किया गया."
ताज महल पर प्रदूषण की मार की वजह से जिन पत्थरों का नुकसान हुआ या जो दरारें पड़ीं उनकी मरम्मत का ज़िम्मा भारतीय पुरातत्व विभाग का है. ये काम भी कई दशकों से चलता आ रहा है. विभाग के सेवानिवृत अधिकारी आरके दीक्षित कहते हैं कि ताज के वास्तविक रंग को बहाल करने के लिए रासायनिक उपचार किया गया. इसके तहत पूरी इमारत पर एक ख़ास तरह का रासायनिक लेप लगाया गया जिससे प्रदूषण का असर कम हो और इमारत में चमक फिर से लौट आए.
मगर पर्यावरणविदों के विरोध के बाद इसे बंद करना पड़ा. पर्यावरण वैज्ञानिकों का दावा है कि रासायनिक लेप की वजह से ताज महल को ज़्यादा नुकसान हुआ है और उसका रंग पहले से भी ज़्यादा पीला पड़ने लगा.
इसका दूसरा कारण वो बताते हैं ज़्यादा सैलानियों का आना. ज्यादा सैलानियों की वजह से उमस भी ज़्यादा होती है जिसका असर पत्थरों पर पड़ता है.
रासायनिक लेप के विरोध के बाद अब पुरातत्व विभाग मिट्टी का लेप लगा रहा है मगर पर्यावरणविद इससे भी खुश नहीं हैं. उनका मानना है कि मिटटी का लेप संग-ए-मरमर को और भी खुरदुरा बना रहा है जिससे नुकसान हो रहा है. संग-ए-मरमर राजस्थान से आने वाली धूल भरी आंधी को झेल नहीं पा रहा है.
रेगिस्तान तेज़ी से आगरा की तरफ बढ़ रहा है. उसके रोकने का एक ही उपाय है पूरे शहर को घने पेड़ों से घेरना.
आगरा के आयुक्त के मोहन राव को सुप्रीम कोर्ट ने ताज महल और आगरा के धरोहरों को बचाने का ज़िम्मा सौंपा है. वो समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट में अपने रिपोर्ट पेश करते हैं. वो ताज ट्रेपेजियम जोन के भी अध्यक्ष हैं.

Monday, September 10, 2018

गठबंधन में हुए हैं कई फेरबदल

इस मसले पर सवर्णों में अच्छी-खासी नाराज़गी बताई जा रही है. यह बात जगजाहिर है कि यह वर्ग भाजपा का कोर वोटर है. अब इसके दो पक्ष हैं. एक कि यह वर्ग भाजपा से ही नहीं सभी राजनीतिक दलों से नाराज़ है.
यही बात भाजपा के लिए उम्मीद की किरण है. क्योंकि नाराजगी के बावजूद उसने किसी और राजनीतिक दल के साथ जाने का फ़ैसला नहीं किया है. दूसरी बात यह कि सवर्ण जितनी ज्यादा नाराजगी दिखाएगा, भाजपा के लिए दलितों को समझाने में उतनी ही आसानी होगी कि उसके भले के लिए पार्टी ने सवर्णों की नाराजगी मोल ली. पर यह तलवार की धार पर चलने जैसा है.
पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम सरकार के लिए चुनावी सरदर्द बन रहे हैं. इस मुद्दे पर मोदी सरकार ने राजनीतिक फ़ायदे के नज़रिए से कदम उठाने की बजाय आर्थिक दृष्टि से व्यवहारिक कदम उठाया है.
सरकार ने न तो सब्सिडी देने का फैसला किया है और न ही केंद्रीय करों में कटौती का. पर सवाल है कि कब तक? नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिज़ोरम में विधानसभा चुनाव हैं.
उसके बाद लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो जाएगी. ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी की तरह आखिरी ओवर में मैच जीतना चाहते हैं. हम सब जानते हैं कि इस रणनीति के कामयाब और नाकाम होने की संभावना बराबर-बराबर होती है. ऐसे मौके पर नेता या बल्लेबाज़ की क्षमता से ज्यादा बड़ी भूमिका उसके आत्मविश्वास की होती है.
पिछले लोकसभा चुनाव में जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन था उसका स्वरूप बदल रहा है. आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू बाहर चले गए हैं. बिहार में जीतन राम मांझी पहले ही जा चुके हैं. तो उपेन्द्र कुशवाहा का एक पैर अंदर और एक बाहर है. शिवसेना पिछले चार साल से 'तुम्हीं से मुहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई' का खेल खेलते-खेलते कुछ ज्यादा दूर निकल गई है.
शिवसेना के भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की उतनी ही संभावना है जितनी कि उद्धव ठाकरे के गठबंधन का मुख्यमंत्री बनने की. बिहार में नीतीश कुमार मन नहीं बना पा रहे हैं कि वे अपने को पटना तक महदूद रखें या दिल्ली का भी टिकट खरीद लें. इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है.
कांग्रेस और चंद्रबाबू नायडू के दुश्मन भाजपा और तेलंगाना राष्ट्र समिति एक-दूसरे को दोस्ती का पैगाम भेज रहे हैं. याद रहे चंद्रशेखर राव भाजपा के ख़िलाफ़ संभावित फेडरल फ्रंट के दूल्हा बनने वाले थे. ओडिशा में भाजपा ने मान लिया लगता है कि नवीन पटनायक को अपदस्थ करना इस चुनाव में तो संभव नहीं है. तो नवीन पटनायक ने भी मान लिया है कि नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के दिनों की दोस्ती को बनाए रखने में कोई हर्ज़ नहीं है.
तमिलनाडु की राजनीति इतनी उलझी हुई शायद ही कभी रही हो. पर इतिहास गवाह है कि वहां की सत्तारूढ़ पार्टी अधिकांशत: केंद्र में सत्तारूढ़ दल के साथ रहती है. जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती रास्ते के स्टेशन से एनडीए की ट्रेन पर सवार हुई थीं और गंतव्य पर पहुंचने से पहले ही उतर गईं या उतार दी गईं.
रोज़गार का मुद्दा नरेन्द्र मोदी सरकार के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल का सबब बना हुआ है. विपक्ष बार-बार इसी पर वार कर रहा है. भ्रष्टाचार के आरोप में पूरे देश में सिकुड़ रही कांग्रेस, रफ़ाएल लड़ाकू विमान सौदे के जरिए भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने का प्रयास कर रही है, पर कितनी सफल होगी कहना मुश्किल है. उसके सामने रफ़ाएल से बड़ा मुद्दा विपक्ष की एकता और राहुल गांधी के नेतृत्व के प्रति विपक्षी दलों की बेरुखी का है.
लोकसभा चुनाव के नज़रिए से सबसे बड़ा सवाल है कि क्या विपक्ष एक हो पाएगा? और एक हुआ तो उसका नेता कौन होगा.
बाद में नेता चुनने वाली राजनीति का समय पीछे छूट गया है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मानना है कि सब मिलकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को हरा दें तो मोदी को रोका जा सकता है. सवाल है कि क्या मायावती इसके लिए तैयार हैं. शुरुआती उत्साह के बाद वे अब बहुत उत्सुक नहीं दिख रहीं.
ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिनपर भारतीय जनता पार्टी की दो दिन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में विचार होगा. पार्टी के सामने समस्याएं हैं तो उपलब्धियां भी हैं. उज्ज्वला, जनधन, बीमा योजना, शौचालय, प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य. फसल बीमा योजना, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी और दूसरी केंद्रीय योजनाओं की उपलब्धियां हैं.
कार्यकारणी की बैठक में इन योजनाओं के लाभार्थियों से पार्टी को जोड़ने की रणनीति तय होगी. सभी मुख्यमंत्रियों/उप मुख्यमंत्रियों से कहा गया है कि वे अपने प्रदेश के ऐसे लाभार्थियों की सूची लेकर आएं.
इस सूची को बूथवार बांटकर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी. इन सबके अलावा भाजपा के पास मोदी के रूप में तुरप का पत्ता है. अपने वादों पर पूरी तरह खरा न उतर पाने के बावजूद मोदी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता में ज्यादा कमी नहीं आई है. सोने पर सुहागा यह है कि चुनावी युद्ध के मैदान में सामने नेतृत्वहीन और बिखरा हुआ विपक्ष है.

Tuesday, September 4, 2018

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब निकाय चुनाव में के साथ क्या हुआ?

लाश नाथ शुक्ल के मुताबिक गांववालों को लग रहा था कि वो अपनी बीमार गाय को छोड़ने जा रहे थे. हालांकि कैलाश ने भीड़ को सफाई दी कि वो गाय को छोड़ने नहीं, उसका इलाज़ करवाने जा रहे हैं. लेकिन भीड़ ने उनकी बात नहीं मानी. इसी बीच भीड़ में से किसी ने कह दिया कि कैलाश अपनी गाय को गांव के ही एक मुस्लिम को बेचने के लिए लेकर जा रहे हैं. इसके बाद तो भीड़ और भी उग्र हो गई और कैलाश की पिटाई शुरू कर दी. पिटाई से कैलाश का हाथ टूट गया है. डॉक्टरों ने उनके दाहिने हाथ पर प्लास्टर चढ़ा रखा है. वहीं कैलाश का आरोप है कि पिटाई के बाद जब वो देहात कोतवाली पहुंचे, तो पुलिस ने केस दर्ज नहीं किया. जब पूरे घटनाक्रम की जानकारी एसपी राजेश कुमार को दी गई, तो उनके आदेश पर केस दर्ज हो पाया. इसके बाद एसपी राजेश कुमार के आदेश पर आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है. इसके अलावा एसपी राजेश कुमार ने उन पुलिसवालों के खिलाफ जांच भी शुरू कर दी है, जिन्होंने कैलाश शुक्ल का मुकदमा दर्ज करने से इन्कार कर दिया था.भले ही बलरामपुर पुलिस ने कुछ आरोपियों को गिरफ्
शहरी निकाय के इन चुनावों में कुल 8340 उम्मीदवार मैदान में थे. इसमें कांग्रेस के 2306, भाजपा के 2203 और जेडी-एस के 1397 उम्मीदवार थे. वहीं शहर निगम चुनावों में 814 उम्मीदवार हैं. इसमें कांग्रेस के 135, भाजपा के 130 और जेडी-एस के 129 उम्मीदवार हैं.
तार कर लिया है, लेकिन ये भीड़ है. भीड़ बच्चा चोरी पर भी न्याय करने लगी है, भीड़ मोबाइल चोरी पर भी न्याय करने लगी है, भीड़ गोकशी पर भी न्याय करने लगी है. पहले ये भीड़ मुस्लिमों को निशाना बना रही थी, तो लोग उन्हें गोतस्कर करार दे रहे थे. भीड़ दलितों को निशाना बना रही थी, तो उन्हें भी गोतस्कर कह दिया जाता था, लेकिन अब जब इस भीड़ के हाथ में मुस्लिम नहीं आ रहा, दलित नहीं आ रहा तो ये भीड़ खाली बैठी है. उसे निशाना चाहिए ही चाहिए. और अब निशाना 70 साल के कैलाश नाथ शुक्ल बने हैं. अगर भीड़ ऐसे ही अराजक होती रही, तो अगला निशाना हम आप कोई भी हो सकते हैं और हमें आपको निशाने पर लेने के लिए भीड़ के पास कोई न कोई नया बहाना मिल ही जाएगा.मई 2018 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आया था. बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी थी. पर वो सरकार बनाते-बनाते रह गई. मिठाई एकदम मुंह में आते-आते रह गई. अब इसी कर्नाटक से फिर भारतीय जनता पार्टी के लिए बुरी खबर आई है. 31 अगस्त को कर्नाटक में 105 निकाय सीटों के 2664 वार्डों पर चुनाव हुए थे. 3 सितंबर को उसके रिजल्ट भी आ गए हैं. यहां भी बीजेपी पिछड़ गई है. कांग्रेस और जेडी-एस ने यहां भी बाजी मार ली है. हालांकि कांग्रेस और जेडी-एस अलग-अलग लड़े थे. अब तक 2664 वार्ड के नतीजे आए हैं. इसमें कांग्रेस ने 982, बीजेपी ने 929 और जेडी-एस ने 375 सीटों पर जीत दर्ज की है.
र्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने इस चुनाव में एक तरह से हार स्वीकार कर ली है. उन्होंने कहा कि गठबंधन सरकार की वजह से पार्टी उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई. हालांकि वो ये जरूर बोले कि 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी बेहतर प्रदर्शन करेगी. येदियुरप्पा ने चुनाव से पहले 50 से 60 फीसदी सीटों पर बीजेपी की जीत का दावा किया था.
अलग-अलग चुनाव लड़े कांग्रेस और जेडीएस
कांग्रेस और जेडी-एस आए नतीजों से भी ज्यादा सीटें ला सकते थे, अगर दोनों साथ मिलकर चुनाव लड़ते. हालांकि अब माना जा रहा है कि चुनाव बाद दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव के लिए फिर साथ आ सकती हैं. पिछली बार 2013 में 4976 सीटों के लिए चुनाव हुए थे. तब कांग्रेस ने 1,960 सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं, जेडीएस ने 905 और भाजपा ने भी 905 सीटों जीत हासिल की थी. हालांकि इस लिहाज से इस बार जेडी-एस का नुकसान हुआ है. सीएम एचडी कुमारस्वामी के लिए ये अच्छी खबर नहीं है.
कर्नाटक निकाय चुनावों से ही एक और खबर आ रही है. यहां पड़ने वाले तुमकुर में कांग्रेस उम्मीदवार के विजय जुलूस पर कुछ अज्ञात हमलावरों ने तेजाब फेंक दिया. इसमें करीब 25 लोग घायल हुए हैं. पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है. हालांकि अभी ये नहीं साफ हो सका है कि हमलावर कौन थे.

Thursday, August 30, 2018

习近平将缺席非正式峰会 联合国气候谈判恐不乐观

据气候会谈内部人士称,中国国家主席习近平将缺席于纽约举行的气候峰会,这使人们对明年联合国巴黎气候会谈前的本次峰会能否取得进展表示忧虑。

习近平主席原计划参加联合国秘书长潘基文于9月23日召集的峰会,现在他会委派另一位中国高级官员前往,但这一说法尚未得到中方证实。

印度总理纳伦德拉·莫迪不久前也宣布将缺席本次会议。因此,这一消息对峰会组织者来说又是一次打击。莫迪计划于9月26日抵达纽约,而不会提前三天抵达去参加这次非正式气候峰会。此举让有关官员倍感无力,他们当中大多数人甚至弄不清楚环境部长是否会代替总理参会。

这种状况下,在刚刚结束的新德里召开的基础四国(巴西、南非、印度和中国)环境部长会议上做出的声明显得更为重要。这份联合声明重申了发展中国家长期以来的立场。

自联合声明发表以来,印度国内有报道称,发达国家曾试图游说菲律宾脱离志同道合的发展中国家集团。这一集团成立于3年前,以表明发展中国家在气候谈判中的立场为目标。这一集团的成员国还包括印度、中国、古巴、委内瑞拉、阿根廷、尼加拉瓜和沙特阿拉伯等。

去年华沙举行的联合国气候变化框架公约( )大会上,菲律宾曾代表这一集团向发达国家施压,要求他们兑现减排承诺并帮助贫穷国家应对气候变化带来的影响。峰会前夕,菲律宾大面积地区刚刚遭受台风海燕的重创,这使其发言更有说服力。

全球应对气候变化全面协议计划将于2015年年底前达成。目前,气候谈判正逐渐升温,联合国秘书长潘基文正是在此背景下召集非正式气候会谈。以美国和欧盟为领导的发达国家敦促全球192个国家做出具有法律约束力的温室气体减排承诺,印度一直对此表示强烈反对。

今年6月,在 波恩总部进行的一次谈判中,委内瑞拉代表团代表发展中国家集团提交了一份全球气候协议草案,这份草案立即遭到很多发达国家代表的反对。印度代表表示,他们正等待 秘书处准备的草案,并且希望草案能够在12月召开的利马峰会前完成。这样一来,各国政府在2015年截止日期前还有1年时间进行谈判。

定期参加 峰会的气候领域非政府组织的领导人近期感到十分担心,因为他们听闻法国政府正在秘密准备协议草案( 年气候峰会将在巴黎召开),这与导致 年哥本哈根大会失败的行为如出一辙。多数发展中国家的谈判代表都迫切希望在截止日期到来前数月发布草案。

联合国秘书长在此背景下召集非正式峰会,希望各国政府领导人能够为谈判施加必要的政治推动力。以美国总统巴拉克·奥巴马为代表的很多发达国家领导人都将出席这次峰会。中国和印度最高领导人的缺席将削弱本次会议的影响力。不过,如果发达国家领导人能就减排和帮助发展中国家做出郑重承诺,他们还是有可能重返谈判席。联合国秘书长设立的一个专家小组已经开始就如何资助所有国家的绿色经济发展提供建议。

联合国秘书长办公室将在峰会上促使企业和民间社会领导人跟政府领导人会面,希望各方能为应对气候变化做出新的承诺和行动计划。这是继哥本哈根峰会后,众多国家领导人首次就同一问题再次举行会晤。环保领域非政府组织正积极行动起来,准备在峰会期间在纽约等地游行响应。

峰会举办之前,潘基文曾说:“办法是有的,我们已经看到很多国家的政策和投资发生着重大改变,人民的生活方式和企业经营方式也在向着可持续的方向发展。很多人已经开始行动,是时候让各国领导人也参与进来,带领世界走向更安全的未来。”

Tuesday, August 28, 2018

सरकार ने किसान आत्महत्याओं के लिए एक नई ‘मुआवज़ा औ

में पंजाब सरकार ने किसान आत्महत्याओं के लिए एक नई ‘मुआवज़ा और राहत नीति’ को लागू किया. 2001 से पाँचवी बार बदली गयी इस नीति के तहत अब किसान आत्महत्याओं के सभी मामलों में पीड़ित परिवार को 3 लाख रुपए दिए जाने का प्रवधान है.
साथ ही किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनज़र पंजाब सरकार ने दो कमेटियों का गठन किया है. सुखबिंदर सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में ग्रामीण आत्महत्याओं के लिए बनी ‘विधान सभा कमेटी’ और टी हक़ की अध्यक्षता में बनी ‘ऋण छूट समिति’. इन कमेटियों ने ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़ाने से लेकर ‘ऋण छूट’ तक पर किसानों के पक्ष में अपनी सिफ़ारिशें तो दे दीं हैं लेकिन उन पर ज़मीनी कार्रवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर सुखपाल सिंह लंबे समय से पंजाब में बढ़ते कृषि संकट पर काम कर रहे हैं. वे राज्य सरकार की ओर से कराए गए ‘डोर टू डोर’ सर्वे के समन्वयक भी रहे हैं. बीबीसी से एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि किसानी में चल रही ‘व्यापार की शर्तें’ किसानों के पक्ष में नहीं जा रहीं.
“बीजों से लेकर खाद, पानी और कीटनाशकों तक पर होने वाले ख़र्च बढ़ते जा रहे हैं और किसान की आमदनी उस हिसाब से बढ़ नहीं रही. यह बढ़ते क़र्ज़ और आत्महत्याओं के पीछे एक बड़ी वजह है. हालात ये है कि पहले जहां पंजाब की कुल कामगार जनसंख्या में से 63 प्रतिशत लोग किसानी थे, वहीं आज राज्य के सिर्फ़ 35 प्रतिशत लोग ही खेती कर रहे हैं.इस 35 प्रतिशत में भी सिर्फ़ 20 प्रतिशत किसान हैं, बाक़ी खेतिहर मज़दूर”.
आगे बरनाला ज़िले के ही बदरा गांव में हमारी मुलाक़ात गुरतेज दास से होती है. 45 वर्षीय गुरतेज के घर में कोई महिला नहीं हैं.
गांव की मुख्य सड़क पर बने एक बदरंग धूल भरे घर में रहने वाले इस हिंदू किसान परिवार के पास सिर्फ़ एक एकड़ ज़मीन है. एक दशक पहले यह परिवार ज़मीन किराए पर लेकर खेती करता था. लेकिन जिस दिन गुरतेज के बड़े भाई निर्मल दास ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या की, उसी दिन यह परिवार बिखर गया.
गुरतेज ने अपना जीवन बड़े भाई के बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करने में लगा दिया. निर्मल के जाने के बाद गांव वालों ने बच्चों की माँ और बड़े भाई की पत्नी सरबजीत कौर से उनका विवाह भी करवा दिया था.
पर सरबजीत उनको और अपने बच्चों को छोड़ कर चली गईं. बिन माँ के बच्चों को बड़ा करना गुरतेज के लिए एक ऐसी चुनौती थी जिसका सामना करने के लिए न तो वह मानसिक तौर पर तैयार थे और न ही आर्थिक.
अपनी धूल भरी रसोई में चाय बानते हुए वह कहते हैं, “जब बच्चों की माँ गई तब छोटा वाला सिर्फ़ 6 साल का था. रातों को उठकर रोता था. अक्सर बीमार पड़ जाता. मुझसे जैसे बनता मैं वैसे खाना बनाकर बच्चों को खिलाता और उनकी देखभाल करता. उनको नहलाता, कपड़े पहनाता और सारे काम करता. फिर मज़दूरी करने जाता और वापस आकर उन्हें खाना बनाकर खिलाता.”
गुरतेज के दोनो बेटे अब बड़े हो रहे हैं. पर वो न तो ख़ुद खेती में लौटना चाहते हैं और न ही बच्चों को किसान बनाना चाहते हैं. वह कहते हैं, “जितनी खेती मैंने की है उससे मुझे यही लगा की किसानी में न ही पड़ें तो अच्छा.
खेती से तो अच्छा है कि बच्चे कोई दुकान खोल लें या मज़दूरी कर लें या किसी फ़ैक्टरी में लग जाएं. खेती में आमदनी होती नहीं, किसान के ख़र्चे बढ़ते जा रहे हैं. इसलिए जब कोई रास्ता नहीं दिखता तो वह सुसाइड कर लेता है. खेती में कुछ नहीं मिलना, उल्टा जान ज़रूर जानी है.”
बदरा गांव से विदा लेते हुए ही हमें पड़ोस के संगरूर जिले के खोखर खुर्द गांव में एक 23 साल के किसान की आत्महत्या की ख़बर मिली.
कर्ज़ और बैंक के नोटिसों ने परेशान नमृत पाल ने 14 जून 2018 की रात रेल की पटरी पर लेटकर आत्महत्या कर ली. पीछे दो छोटे बच्चे, पत्नी और बूढ़े माँ-बाप को छोड़ गए नमृत अक्सर उदास रहते और अपनी माँ से कहते, ‘माँ मेरा मरने को जी करता है’. अपनी शादी की तस्वीर में नमृत किसी नौजवान रंगरूट की तरह लगते हैं. अपने पिता के मातम में मासूमियत से चिप्स खाते उनके बच्चे, उनको ‘लाड़ी-लाड़ी’ कहकर पुकारती उनकी पत्नी और दहाड़ें मार मार कर रोती उनकी माँ गुरमीत कौर को देखकर पंजाब की एक स्याह तस्वीर मेरे सीने में धंस गई.
आगे पंजाब छोड़ते हुए हमारी मुलाक़ात ‘भारतीय किसान यूनियन एकता-उगराहन’ नामक स्थानीय किसान संगठन के बैनर तले एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे किसानों से हुई. पीले झंडे लिए जत्थों में चलते हुए ये किसान सरकार की ओर से धान की रोपाई की तय तारीख़ के ख़िलाफ़ अपना विरोध जताने बरनाला शहर जा रहे थे.
मैंने वहां खड़े किसानों से बातचीत में पूछा कि हरित क्रांति की इस धरती पर आज इतने किसान ख़ुदकुशी क्यों कर रहे हैं.
तभी अपने संगठन का झंडा हाथ में पकड़े एक बुज़ुर्ग किसान ने अपना नाम बारह सिंह बताते हुए कहा, “हरित क्रांति से सिर्फ़ बीज कंपनियों, पेस्टीसाइड कंपनियों और ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों का फ़ायदा हुआ है. हमें महंगे बीज, महंगी खाद बेच गए कंपनी वाले. बड़े ट्रैक्टरों बेच के मुनाफ़ा कमा गई कंपनियां. हमें क्या मिला? सिर्फ़ इन सामनों को ख़रीदने के लिए लिया गया कर्ज़ा.
कभी कीड़ों से तो कभी ओलों से फ़सल ख़राब हो जाती है. सरकार की तरफ़ से कोई मुआवज़ा या लोन माफ़ी नहीं मिलती. हर बार सरकार पंजाब के किसानों के संकट को सिर्फ़ कमेटियों की सिफ़ारिशों में दबा के रख देना चाहती है.
ज़मीन पर मिमिनम सपोर्ट प्राइस पर फ़सल बेचने के लिए भी हमें लड़ाइयां लड़नी पड़ती हैं. ऐसे में किसान आत्महत्या न करे तो और क्या करे”.
11 जुलाई को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को उनकी मुआवज़ा और राहत नीति पर फटकार लगाते हुए कहा कि मुआवज़ा सिर्फ एक अंतरिम उपाय है.
सरकार को बढ़ती किसान आत्महत्यायों के कारणों पर एक हलफनमा दाख़िल करने का आदेश देते हुए अदालत यह भी पूछा की सरकार बढ़ती किसान आत्महत्यायों को रोकने के लिए क्या दीर्घकालिक उपाय कर रही है. फिलहाल सरकार अदालत में प्रस्तुत करने के लिए जवाब तैयार कर रही है पर इस जवाब का असली इंतज़ार तो पंजाब के किसानों को है