Thursday, April 25, 2019

श्रीलंका की इन दर्दनाक तस्वीरों का सच: फ़ैक्ट चेक

बीते दो दिनों से कुछ वीभत्स तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं और दावा किया जा रहा है कि मानवीय त्रासदी की ये तस्वीरें श्रीलंका में हुए सीरियल बम धमाकों के बाद की हैं.
इन तस्वीरों को ट्विटर और फ़ेसबुक के अलावा शेयरचैट ऐप पर भी सैकड़ों बार शेयर किया गया है.
हमने पाया कि इसी दावे के साथ इन तस्वीरों को वॉट्सऐप पर भी अब सर्कुलेट किया जा रहा है.
21 अप्रैल 2019 को श्रीलंका के कई शहरों में हुए सीरियल बम धमाकों में मरने वालों की संख्या बुधवार तक बढ़कर 359 हो गई थी और 500 से ज़्यादा लोग घायल हैं.
लेकिन इन वायरल तस्वीरों की जब हमने पड़ताल की तो पाया कि ये सभी श्रीलंका की पुरानी तस्वीरें हैं जिनका हालिया बम धमाकों से कोई संबंध नहीं है.
इस फे़सबुक पोस्ट में दिख रहीं दोनों वायरल तस्वीरें 16 जून 2006 की हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी और फ़ोटो एजेंसी गेटी के अनुसार 15 जून 2006 को एक बारूदी सुरंग फटने से इन लोगों की मौत हुई थी. इस हादसे में 60 से ज़्यादा लोग मारे गये थे.
पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हमलावरों ने एक बस को निशाना बनाया था.
उस समय श्रीलंका की सरकार ने आरोप लगाया था कि इस घटना के पीछे चरमपंथी संगठन 'लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम' यानी एलटीटीई का हाथ है.
हालांकि एलटीटीई ने अपनी तरफ से जारी किए बयान में सरकार के आरोप को बेबुनियाद बताते हुए ख़ारिज कर दिया था.
मीडिया रिपोर्ट्स में इस घटना में मरने वालों की संख्या 64 बताई गई थी जिनमें 15 बच्चे शामिल थे. इस घटना में क़रीब 80 लोग घायल भी हुए थे.
सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को शेयर कर ये दावा किया जा रहा है कि 'ईस्टर संडे को श्रीलंका में हुए सीरियल बम धमाकों में मारी गई ये सबसे छोटी बच्ची की तस्वीर है'.
इस वायरल तस्वीर में एक शख़्स बच्ची के शव के क़रीब बैठा हुआ रोता दिखाई दे रहा है. फ़ेसबुक पर मौजूद कई धार्मिक ग्रुप्स में इस तस्वीर को इसी दावे के साथ शेयर किया गया है.
सीरियल बम धमाकों पर लिखे गए कुछ ब्लॉग्स भी हमें मिले जिनमें यह तस्वीर इस्तेमाल की गई है. एक ब्लॉग राइटर ने इस लड़की को 'कोलंबो की सबसे युवा शहीद' कहा है.
लेकिन रिवर्स सर्च से हमें पता चला कि यह तस्वीर एक साल पहले से फ़ेसबुक पर शेयर की जा रही है. यानी इस तस्वीर का ईस्टर संडे के हादसे से कोई वास्ता नहीं है.
रिवर्स सर्च से हमें फ़ेसबुक पर इस तस्वीर की जो सबसे पुरानी पोस्ट मिली, वो 12 मई 2018 की है.
इस पोस्ट में फ़ेसबुक यूज़र ने लिखा है, "मैं ये दुख कैसे सहूंगा. प्लीज़, कभी किसी पिता को दुनिया में ऐसी तकलीफ़ का सामना न करना पड़े."

Friday, April 12, 2019

आपको ये भी रोचक लगेगा

ब्रिटेन के गृह सचिव साजिद जाविद ने ट्वीट किया है, "मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूं कि जूलियन असांज पुलिस हिरासत में हैं और इस समय ब्रिटेन में कोर्ट की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं."
इक्वाडोर के राष्ट्रपति ने कहा कि अन्य देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने के बाद असांज के व्यवहार को लेकर हमारे देश का धैर्य ख़त्म हो गया है.
मोरेनो ने कहा, "ताज़ा मामला जनवरी 2019 का है, जब विकीलीक्स ने वैटिकन के दस्तावेज़ लीक किया था."
उन्होंने कहा, "ये और अन्य प्रकाशनों से दुनिया का ये संदेह स्पष्ट हो गया है कि असांज अभी भी विकीलीक्स से जुड़े हए हैं और इसलिए वो अन्य देशों के अंदरूनी मसलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं."
असांज का प्रत्यर्पण क्यों चाहता है अमरीका?
असांज ने साल 2006 में विकीलीक्स की स्थापना की. इसका उद्देश्य गोपनीय दस्तावेज़ और तस्वीरों को प्रकाशित करना था.
विकिलिक्स ने चार साल बाद तब सुर्खियां बटोरी जब उसने एक फ़ुटेज जारी किए जिसमें अमरीकी सैनिक इराक़ में हेलिकॉप्टर से आम नागरिकों की हत्या कर रहे थे.
इस खुलासे में उनका साथ देने वाली अमरीकी विश्लेषक चेल्सी मैनिंग को साल 2010 में अमरीका मे गिरफ़्तार किया गया. उनपर आरोप था कि उन्होंने 7 लाख गोपनीय दस्तावेज़, वीडियो और डिप्लोमैटिक केबल का खुलासा एंटी सीक्रेसी वेबसाइट के साथ मिलकर किया.
चेल्सी के मुताबिक़ उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि अमरीका की विदेश नीति पर बहस शुरु हो लेकिन अमरीका का कहना है कि उन्होंने ऐसा करके कई जानों को ख़तरे में डाल दिया है.
पिछले साल वर्जीनिया राज्य में जारी किए गए असांजे के ख़िलाफ़ अभियोग में आरोप है कि उन्होंने 2010 में मैनिंग के साथ रक्षा विभाग की गोपनीय जानकारी हासिल करने की साज़िश रची थी.
अभियोग के मुताबिक़ मैनिंग ने जनवरी और मई 2010 के बीच अमरीकी विभागों और एजेंसियों से चार डेटाबेस डाउनलोड किए और इसे विकिलीक्स को मुहैया कराई.
अमरीका का न्याय विभाग ने इसे "संयुक्त राज्य अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी गोपनीय जानकारी के साथ छेड़छाड़'' का मामला बताया है.
अभियोग का आरोप है कि कंप्यूटर पर पासवर्ड को क्रैक किया गया. चेल्सी मैनिंग ने इन दस्तावेज़ों के लिए इस तरह से लॉग ऑन किया ताकि जांचकर्ताओं के लिए खुलासे के स्रोत को तय कर पाना कठिन हो.
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में इलेक्टोरल बॉन्ड पर तत्काल कोई रोक नहीं लगाई है लेकिन सभी पार्टियों से अपने चुनावी फंड की पूरी जानकारी देने को कहा है.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़, कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि चुनावी बॉन्ड के मार्फ़त चंदा देने वालों की पूरी जानकारी, कितना चंदा मिला, हर बॉन्ड पर कितनी राशि प्राप्त हुई उसकी पूरी जानकारी चुनाव आयोग को उपलब्ध कराएं.
कोर्ट ने कहा है कि 15 मई तक मिले चंदे की सारी जानकारियां एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में 30 मई तक चुनाव आयोग के पास जमा कराई जाएं.
सुप्रीम कोर्ट ने वित्त मंत्रालय को आदेश दिया कि वो अपने नोटिफ़िकेशन में संशोधन करे और इलेक्टोरल बॉन्ड की ख़रीद के लिए अप्रैल और मई में दिए गए पांच अतिरिक्त दिन को हटाए.
इस मामले में सुनवाई के दौरान पहले अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट से फिलहाल हस्तक्षेप न करने की अपील की थी.

Tuesday, April 2, 2019

थाली से खेतों तक का सफ़र

पूर्वोत्तर राज्य असम के पकवानों का ज़ायक़ा दिल लुभाता रहा है, राज्य की पारंपरिक थाली में व्यंजनों की विविधता है और यही इस इलाक़े की पहचान भी है.
कई ऐसे व्यंजन हैं जो अहोम राजाओं के दौर से प्रचलित हैं. राज्य के कुछ-कुछ इलाक़ों में बनने वाले व्यंजन वैसे ही हैं जैसे बर्मा और थाईलैंड में पकाये जाते हैं. वैसे तो चावल ही यहाँ का मुख्य आहार है. मगर अब दालें और सब्ज़ियां भी उगाई जा रही हैं.
ऊपरी असम से लेकर निचले असम तक पारंपरिक खाने की थाली में परोसे गए व्यंजन अलग-अलग होते हैं और उनका स्वाद भी. अहोम लोगों के पकवान या फिर बोडो और अन्य जनजातियों के व्यंजन एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं और उनका स्वाद भी क्षेत्र के हिसाब से बदलता रहता है.
कश्मीर से लेकर पूर्वी और मध्य भारत के अलावा दक्षिण भारत में भी खाना पकाने के तरीक़े अलग रहे हैं.
ये लोगों के स्वाद पर ही निर्भर है जहाँ मध्य और दक्षिण भारत में तेज़ मसालों का इस्तेमाल होता है, वहीं असम में भी पकवान मसालेदार होते हैं. लेकिन पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड में मसालों का कम इस्तेमाल किया जाता है.
दूसरे प्रदेशों की तरह ही असम के किसान भी अपने व्यंजनों का उत्सव मनाते हैं मगर असम में मूलतः आजीविका के लिए धान और सब्जियां उगाई जाती हैं और लोग अपने खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं.
इनमें ज़्यादा संख्या महिलाओं की है जो खेतों में काम करती हैं. राज्य के मुख्य त्योहार भी फ़सलों की कटाई और बुवाई के इर्द-गिर्द ही मनाए जाते हैं. नाबानिदी गोगोई जोरहट के बोलोमा मोरन गाँव के रहने वाले एक किसान हैं.
गोगोई और उनका परिवार आजीविका के लिए खेती करता रहा है, वो धान की फ़सल को घाटे को सौदा मानते हैं.
बीबीसी से बात करते हुए नाबानिदी गोगोई कहते हैं कि सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में उन्होंने सिर्फ़ अख़बारों में पढ़ा है या टीवी पर सुना है.
वे कहते हैं, "मैं जब अपना धान बेचने मंडी जाता हूँ तो मुझे उतने भी पैसे नहीं मिलते जितने मैंने उगाने के लिए ख़र्च किए हैं. उलटा जेब से ही ख़र्च हो रहा है."
बाज़ार और उचित मूल्य के अभाव में असम के किसानों का संघर्ष लगातार जारी है. कभी बाढ़ की मार तो कभी मौसम, इनके लिए खेती करना मुश्किल भरा काम होता जा रहा है. हर साल ऊपरी और निचले असम के कई इलाके़ बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं.
बाढ़ से फ़सलों का नुक़सान तो होता ही है मगर जब पानी उतरता है तो ज़मीन उपजाऊ नहीं रह जाती. किसानों को इस ज़मीन को फिर से खेती के लायक़ बनाने के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है और इस काम में महीनों या फिर पूरा साल भी लग सकता है.
वैसे जो धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने तय किया है, वो 1500 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि किसानों को 900 रुपये भी नहीं मिल पाते हैं. इसीलिए असम के किसान संघर्ष ही कर रहे हैं. इस संघर्ष में महिला किसानों की भागीदारी ज़्यादा है क्योंकि वो घर भी संभालती हैं और खेत भी.
इसका जवाब तलाश करने के लिए मैं जोरहट के एक गाँव पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं खेतों में काम कर रहीं थी. वो पुरानी फसल काट रहीं थीं ताकि नई फ़सल बोने के लिए खेत तैयार हो सकें. ये पारंपरिक त्योहार बिहु का भी मौक़ा था.
पारंपरिक वेशभूषा में ये महिला किसान, मेहनत के साथ साथ खतों में सांस्कृतिक बिहु के नाच का आनंद भी ले रहीं थीं. उनके साथ बच्चे भी हाथ बंटा रहे थे. महिला किसानों के झुंड ने हमें घेर लिया और एक-एक करके अपनी परेशानियां साझा करनी शुरू कर दीं.
वो बताने लगीं कि आज भी वो उसी तरह से खेती कर रही हैं जैसी सौ साल पहले होती रही थी.
यहीं की गोनोबती भुइयां कहती हैं, "असम के ज़्यादातर किसानों के पास न मशीनें हैं ना ट्रैक्टर. हम खेती के लिए पूरी तरह से बारिश और नदी के पानी पर निर्भर हैं. खेतों में हल चलातें हैं क्योंकि ट्रैक्टर नहीं हैं और हाथों से ही बीज की बुवाई करते हैं. कुछ धान उगता है. कुछ दालें और सब्ज़ियां भी. मगर वो हमारे परिवार को चलाने के लिए काफ़ी नहीं हैं. इसलिए हमें मज़दूरी की तलाश भी करनी पड़ती है."
इसी इलाके के एक किसान ने बताया कि उन्हें खेती के लिए बैंकों से कर्ज़ भी नहीं मिल पाता. वो कहते हैं जब वो स्थानीय कृषि अधिकारी से लोन के लिए संपर्क करते हैं तो वे उन्हें सीधे बैंकों से संपर्क करने की सलाह दे डालते हैं. "कोई हमारी मदद नहीं करता."
महिला किसान अनीता सैकिया का आरोप था, "मौसम की वजह से या फिर कीड़े लग जाने की वजह से अगर फ़सल बर्बाद हो जाती है तो कोई स्थानीय अधिकारी देखने तक भी नहीं आता. मुआवज़ा तो दूर की बात है."
बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं, "सिलापथार और आसपास का इलाक़ा आज भी पिछड़ा हुआ है जबकि इसकी दूरी जोरहाट से ज़्यादा नहीं है. यहां के सैकड़ों गाँव ऐसे हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है. उस पर से तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने कृषि को एक महँगा धंधा बना दिया है. अब यहां के युवा खेती छोड़ दूसरे राज्यों में जाकर नौकरियां करना बेहतर समझ रहे हैं."
धान की खेती में हो रहे घाटे की वजह से ऊपरी और निचले असम में किसान सब्ज़ियां भी उगा रहे हैं लेकिन उन्हें इसमें भी ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाता क्योंकि इनके पास न नई तकनीक है, न सिंचाई के उपकरण और ना ही बाज़ार. ऊपर से बाढ़ की मार और मौसम का क़हर.
असम के किसान देश के बाक़ी के हिस्सों के किसानों से इसलिए अलग हैं क्योंकि ये मूलतः आजीविका के लिए खेती करते आ रहे हैं और वो भी पारंपरिक तरीके़ से. पूरे राज्य के किसानों का एक बड़ा तबक़ा ऐसा है जिनकी ज़िंदगी में टेक्नॉलॉजी की कोई ख़ास भूमिका नहीं है.

Monday, January 21, 2019

إعلان جديد لشفرات الحلاقة "جيليت" يثير جدلا ودعوة لمقاطعة منتجاتها

تسبب إعلان جديد طرحته شركة "جيليت" يوصف بأنه يشير إلى التنمر وحركة "أنا أيضا" المناهضة للتحرش الجنسي ضد المرأة والذكورية العدوانية إلى انقسام الرأي على الإنترنت.
وتلاعب إعلان جيليت، المتخصصة في صناعة شفرات الحلاقة، بشعارها الشهير "أفضل ما يمكن أن يحصل عليه رجل" واستبدلته بشعار يقول "أفضل الرجال يمكنهم".
وتقول الشركة إنها ترغب من الرجال أن "يحاسبوا" بعضهم بعضا.
وأشاد البعض بالرسالة التي يطرحها الإعلان، الذي يهدف إلى تحديث شعار الشركة الذي تبنته طوال 30 عاما، في حين يقول آخرون إن جيليت "ماتت" بالنسبة لهم.
وحقق الإعلان نسبة مشاهدة على موقع يوتيوب بلغت أكثر من مليوني مشاهدة خلال 48 ساعة.
وتطرح الشركة من خلال الإعلان سؤالا "هل هذا أفضل ما يمكن أن يحصل عليه رجل؟" قبل عرض صور لتنمر وتحرش جنسي وسلوكيات تمييزية على أساس الجنس وسلوك ذكوري عدواني.
كما يقدم الإعلان أمثلة لسلوكيات أكثر إيجابية، مثل منع حدوث
وأضاف سوندرز :"إعلانهم أدى إلى دعاية جيدة وأرقام جيدة و تسبب في جدل، وهو شيء كان يجب أن يعرفوه عندما وضعوا هذا الإعلان".
وقال روب إن جيليت ستتوقع رد فعل سلبيا من بعض الناس تجاه إعلانها.
وأضاف: "وافق على هذا الإعلان كثيرون في الإدارة العليا لجيليت. لذا كان يجب أن يعرفوا أنه سيكون هناك رد فعل عنيف".
ويعتقد روب أن رد الفعل القوي سببه أن مثل هذا الإعلان بمثابة تحول بشأن ما كانت تروج له جيليت سابقا، وهو ما تسبب في مفاجأة للناس.
وأضاف :"إنه تغيير في موقف جيليت ويحدث بين عشية وضحاها، لاسيما مع التعليق الاجتماعي وهذا هو سبب تسجيل هذه الأرقام الهائلة".

"لابد أن يحدث هذا الحوار"

وعلى نقيض رد الفعل السلبي تجاه الرسالة الجديدة التي تطرحها الشركة، كان هناك أيضا الكثير من المدح والإشادة بسعي الشركة إلى الانضمام في حوار بشأن ما تعنيه الرسالة للرجل الحديث.
وقال غاري كومب :"نعرف أن الانضمام للحوار بشأن (الرجولة الحديثة) يعني تغيير طريقة تفكيرينا وصورتنا للرجال في كل مكان".
وأضاف: "ستراجع جيليت فورا المحتوى العام بالاستعانة بمجموعة من المعايير المحددة التي تهدف إلى ضمان مباديء الاحترام والمحاسبة وتحديد قالب لدورها في الإعلانات التي نطرحها، والصور التي ننشرها على وسائل التواصل الاجتماعي والكلمات التي نختارها، وأشياء أخرى".
هذه السلوكيات عندما تحدث في أماكن عامة.
وجنحت التعليقات على الفيديو إلى حد كبير إلى السلبية، وقال مشاهدون إنهم لن يشتروا منتجات جيليت مرة أخرى، على الإطلاق، ومنهم من قال إن الإعلان "دعاية نسائية".
وكتب أحد المشاهدين تعليقا غاضبا جاء فيه: "استطعتم في أقل من دقيقتين القضاء على أكبر حزمة مبيعات لمنتجاتكم، أحسنتم".
كما أعرب مستخدمو توتير عن خيبة أملهم من حملة جيليت الدعائية الجديدة.
ودعوا جيليت، التي تملكها شركة "بروكتير آند غامبل"، إلى نشر فيديو اعتذار.
بيد أن الشركة تعتقد أن إعلانها الجديد يتوافق مع شعارها، وقالت إنها تؤمن "بالأفضل في الرجال".
وقال غاري كومب، رئيس الشركة: "من خلال محاسبة بعضنا بعضا، ورفض الأعذار عند حدوث سلوك سيء، ودعم جيل جديد يعمل تجاه (أفضل) ما في شخصيته، نستطيع أن نساعد في إحداث تغيير إيجابي مهم خلال السنوات المقبلة".

"كان لابد أن يعرفوا أنه سيكون هناك رد فعل عنيف"

لكن على الرغم من أن رد الفعل تجاه الإعلان كان سلبيا إلى حد كبير، فإن المثل المأثور يقول "لا يوجد شيء يعرف باسم الدعاية السيئة".
وقال روب سوندرز، مدير حسابات في شركة "ميديا إجينسي غروب" البريطانية للدعاية والإعلان، لبي بي سي :"خطواتهم القادمة مهمة للغاية، لكن لا ينبغي أن ينتشر مثل هذا الذعر بالضرورة".

Thursday, December 20, 2018

ثمانية أسباب قد تجعلك تستمتع بتناول طعامك وحدك

ليس كل شخص يحب أن يتناول الطعام بمفرده.
بعض الناس يجدون ذلك الأمر مملا، بينما يشعر آخرون بالخجل أو القلق، لدرجة قد تجعلهم يأجلون تناول الطعام تماما، حتى يصبحوا بمفردهم.
شيلا ديلون مراسلة برنامج الطعام، الذي يذاع على راديو "بي بي سي 4"، توصلت إلى ثمانية أسباب، قد تجعل تناولك الطعام بمفردك شيئا جيدا.

1: يمكنك تناول أي طعام تحبه.

تناول الطعام بمفردك يجعلك حرا، في اختيار الطعام الذي تأكله، دون الأخذ في الاعتبار تفضيلات الآخرين.
فربما كنت تحب طعاما ذا رائحة نفاذة، لا يتحملها آخرون، وربما كنت من عاشقي الكربوهيدرات، وتخجل من ابتلاع طبق من البطاطس، أو سلطانية من المكرونة، داخل الشركة التي تعمل بها.

2: لن تضطر إلى أن يشاركك الأخرون طعامك.

هل جربت ذات مرة أن تطلب الطبق اللذيذ، الذي ربما كنت تحلم به منذ شهور، لتجد أصدقاءك يرغبون في تجريبه، ويتركون لك فقط الملعقة الأخيرة منه؟
قد يكون تناول الطعام بمفردك أكثر هدوءا، ويوفر لك فرصة لتناول وجبتك بالكامل، دون أن تترك منها الفتات.

3: ربما يسهل عليك هذا الأمر الحفاظ على نظام غذائي صحي.

إذا كنت تحاول اتباع نظام غذائي صحي، فإن تناول طعامك بمفردك ربما يعني فرصة أكبر، للالتزام بهذا النظام.
وأفادت دراسة، مقدمة لجمعية القلب الأمريكية، بأن متبعي الأنظمة الغذائية يواجهون احتمالا بنسبة 60 في المئة، للتخلي عن أنظمتهم، حينما يأكلون برفقة آخرين.
وأشارت دراسة، أعدها طبيب نفسي في جامعة ولاية جورجيا الأمريكية، إلى أن الأكل الجماعي يتسبب في أن يأكل الأشخاص كميات أكبر بنسبة 44 في المئة، بما في ذلك كميات أكبر من الدهون.

4: يمكنك أن تأكل حسب سرعتك.

تشير الأبحاث إلى أننا عموما نضبط طريقتنا في الأكل، لتعكس سلوك الشخص الذي برفقتنا.
وكشفت إحدى الدراسات أنه في حال تناول امرأتين شابتين للطعام معا، فإنهما ستميلان إلى التزامن في أكلهما، إلى درجة أن كل منهما قد تتناول قضمة من الطعام، بعد الأخرى مباشرة.
الأسر التي تتكون من شخص واحد هي الأسرع نموا، من بين التركيبة السكانية عالميا، ويعيش نحو 300 مليون شخص بمفردهم حول العالم، وذلك وفقا لأرقام الأمم المتحدة ومنظمات أخرى.
وحتى إذا كنت تعيش برفقة آخرين، تشير التقديرات إلى أن نحو نصف وجبات الطعام للبالغين، يتناولها أشخاص بمفردهم.
إذن ما دام من المرجح أن ينتهي بك الأمر إلى تناول طعامك بمفردك، فمن الأفضل أن نتقبل الأمر بسرور.

Monday, November 12, 2018

थुरा को तीर्थ स्थल घोषित कर यहां मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगायेगी योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार राम की नगरी अयोध्या और कृष्ण की नगरी मथुरा को तीर्थ स्थान घोषित कर वहां मांस-मदिरा की बिक्री तथा सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है । 
उप्र सरकार के प्रवक्ता और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने सोमवार को 'भाषा' से विशेष बातचीत में कहा 'साधु संतों और करोड़ों भक्तों की मांग थी कि राम और कृष्ण की नगरी में मांस-मदिरा की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया जाये ।

उनकी मांग का सम्मान करते हुये प्रदेश सरकार अयोध्या की चौदह कोसी परिक्रमा के आसपास के इलाके और मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के आसपास के इलाके को तीर्थ स्थान घोषित करने की योजना पर काम कर रही है। जब ये दोनों स्थान तीर्थ स्थान घोषित हो जायेंगे तो यहां स्वत: ही मांस-मदिरा की बिक्री पर प्रतिबंध लग जायेगा । बिना तीर्थ स्थान घोषित किये इन दोनों स्थानों पर मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगाना संभव नही है ।'
 
उन्होंने कहा 'अयोध्या और मथुरा में मांस-मदिरा पर प्रतिबंध की मांग को सरकार ने गंभीरता से लिया है और इन दोनों जगहों को तीर्थ स्थान घोषित करने की योजना पर काम किया जा रहा है।’’ ऊर्जा मंत्री ने कहा कि अयोध्या में चौदह कोसी परिक्रमा का इलाका, मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्म स्थान के आसपास के इलाके को तीर्थ स्थान घोषित कर यहां पर मांस-मदिरा पर प्रतिबंध लगाये जाने की योजना है । 

शर्मा के मुताबिक, मथुरा में वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, गिरिराज जी :गोर्वधन: की सप्त कोषी परिक्रमा का इलाका पहले से ही तीर्थस्थान घोषित है और वहां मांस-मदिरा की बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबंध है ।

गौरतलब है कि छह नवंबर को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले का नाम बदलकर अयोध्या कर दिया गया है। संतों ने मांग की थी कि अयोध्या में मांस-मदिरा की बिक्री भगवान राम का अपमान है और इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। रकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार 36 राफेल विमानों की खरीद के संबंध में किये गए फैसले के ब्योरे वाले दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंप दिए हैं। दस्तावेजों में कहा गया है कि राफेल विमानों की खरीद में रक्षा खरीद प्रक्रिया-2013 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है। दस्तावेजों में कहा गया है कि विमान के लिए रक्षा खरीद परिषद की मंजूरी ली गई थी। भारतीय दल ने फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत भी की। दस्तावेजों में कहा गया है कि सौदा नियमों के मुताबिक हुआ। जिसके लिए 74 बैठकें हुई थीं। दस्तावेजों में कहा गया कि फ्रांसीसी पक्ष के साथ बातचीत तकरीबन एक साल तक चली और समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले मंत्रीमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति की मंजूरी ली गई।

इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने राफेल सौदे की निर्णय प्रक्रिया का पूरा विवरण प्रस्तुत किया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की बेंच ने केंद्र से निर्णय लेने की प्रक्रिया से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी थी। बता दें राफेल सौदे में लड़ाकू विमान की कीमतों को लेकर विपक्षी पार्टियां शुरू से ही केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगा रही हैं।

मामले की सुनवाई सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच कर रही है। कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि वह डिफेंस फोर्सेज के लिए राफेल विमानों की उपयुक्तता पर कोई राय नहीं देना चाहते और न ही कोई नोटिस जारी कर रहे हैं। कोर्ट केवल फैसला लेने की प्रक्रिया की वैधता जानना चाहता है।

इस सौदे का विरोध कर रही मुख्य विपक्षी पार्टी का कहना है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से विमान खरीद रही है जबकि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान इसकी कीमत 526 करोड़ रुपये तय हुई थी।

Wednesday, October 10, 2018

投资者加大对电力企业气候变化应对措施审查力度

力企业——生产和提供电力的公司——是否已经准备好迎接气候变化相关政策和行动带来的各种变化?如果没有,那我们为什么要严肃看待这件事情?

我们大多数人的养老金都或多或少与电力公司相关。2007年到2008年期间,欧盟地区2020年气候与能源框架协议正式通过,该协议将极大提高可再生能源的使用比例。在此之前,欧洲的电力企业业绩表现都不错,而协议通过之后,这些公司就开始走下坡路了。

包括可再生能源比例上升等多种原因导致电力部门日益分散化,从而导致天然气和燃煤电厂这样的资本密集型基础设施建设的性价比也越来越低,并进而为那些继续严重依赖煤炭能源的大型电厂带来重重风险。

巴黎气候协议于去年12月正式通过,目前已经有177个国家签署了这份协议。该协议有望加快全球发电与配电产业结构的转型升级。

为了达到这个目标,我们必须告别对化石燃料的依赖,以低碳能源作为未来经济发展的基础,实现全球经济的大转型。

中国是首批签署巴黎气候协议的国家之一,同时也正逐渐成为落实协议内容、实现“低碳转型”的重要推动力量。

比如,截至2016年4月的一年间,中国新增太阳能装机达710万千瓦——相当于将中国的太阳能光伏发电能力提升了将近整整一倍。

中国计划在2030年前将低碳能源消费比例提升到20%左右——也就是将中国的低碳能源装机再增加8-10亿千瓦,甚至超过了中国现有的燃煤装机总量。

华北电力大学的一项最新研究(覆盖中国燃煤发电最集中的6个省份)显示,中国的煤炭产业在未来几年内将变得无利可图。这也从某种程度上解释了,为什么最近中国决定停建近200座燃煤发电厂(发电能力约为1.05亿千瓦)。

投资者对于低碳转型挑战传统电力企业的做法予以认可。因为投资者明白,电力企业的商业策略与资本配置将直接影响到未来几十年企业的可持续性和盈利能力。

因此,越来越多的投资者,尤其是各种养老基金,都希望电力企业能够积极做好准备,充分利用好低碳转型这个机遇。

所以,今年4月29日,由四大组织(包括气候变化亚洲投资者集团)所组成的全球网络发布了一份电力公共事业企业应对气候风险的指导文件。该网络代表了全球270多家机构投资者,资产总额超过20万亿欧元(约合148万亿人民币)。

该文件对未来行业管理提出了6点关键希望,其中包括:行业透明度;信息披露;商业策略(包括开展模拟或‘压力测试’,研究在国家为了落实巴黎气候条约而出台相应法规与公共条例的情况下,企业如何开展经营活动);运营效率;去碳化(企业摆脱化石燃料的过程);以及提高新技术的使用与整合水平,造福居民日常生活和整体环境健康。

同时,投资者还提醒电力企业应告诉消费者(通过节能手段)到底帮他们节约了多少度电,以及这些能源在整体电力销售中的占比。

任何简单的方法都不足以衡量消费者的总体满意度,如今这种趋势更是越加明显。那些声称已经采取了气候变化应对措施的电力企业必须要向消费者做出详尽解释,比如为了与太阳能企业建立全新伙伴关系他们正在做(或没有做)什么,以及在开发“智能电网”和能源储存解决方案方面投入了多少资金等。

此外,投资者希望电力企业不仅能够说明到底有多少消费者正在使用智能电表,而且还想知道这种新技术到底给消费者带来了多大的好处。


免费下载《投资者对电力企业的期望:细数煤炭资产风险》