Thursday, April 25, 2019

श्रीलंका की इन दर्दनाक तस्वीरों का सच: फ़ैक्ट चेक

बीते दो दिनों से कुछ वीभत्स तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं और दावा किया जा रहा है कि मानवीय त्रासदी की ये तस्वीरें श्रीलंका में हुए सीरियल बम धमाकों के बाद की हैं.
इन तस्वीरों को ट्विटर और फ़ेसबुक के अलावा शेयरचैट ऐप पर भी सैकड़ों बार शेयर किया गया है.
हमने पाया कि इसी दावे के साथ इन तस्वीरों को वॉट्सऐप पर भी अब सर्कुलेट किया जा रहा है.
21 अप्रैल 2019 को श्रीलंका के कई शहरों में हुए सीरियल बम धमाकों में मरने वालों की संख्या बुधवार तक बढ़कर 359 हो गई थी और 500 से ज़्यादा लोग घायल हैं.
लेकिन इन वायरल तस्वीरों की जब हमने पड़ताल की तो पाया कि ये सभी श्रीलंका की पुरानी तस्वीरें हैं जिनका हालिया बम धमाकों से कोई संबंध नहीं है.
इस फे़सबुक पोस्ट में दिख रहीं दोनों वायरल तस्वीरें 16 जून 2006 की हैं.
समाचार एजेंसी एएफ़पी और फ़ोटो एजेंसी गेटी के अनुसार 15 जून 2006 को एक बारूदी सुरंग फटने से इन लोगों की मौत हुई थी. इस हादसे में 60 से ज़्यादा लोग मारे गये थे.
पुरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हमलावरों ने एक बस को निशाना बनाया था.
उस समय श्रीलंका की सरकार ने आरोप लगाया था कि इस घटना के पीछे चरमपंथी संगठन 'लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम' यानी एलटीटीई का हाथ है.
हालांकि एलटीटीई ने अपनी तरफ से जारी किए बयान में सरकार के आरोप को बेबुनियाद बताते हुए ख़ारिज कर दिया था.
मीडिया रिपोर्ट्स में इस घटना में मरने वालों की संख्या 64 बताई गई थी जिनमें 15 बच्चे शामिल थे. इस घटना में क़रीब 80 लोग घायल भी हुए थे.
सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को शेयर कर ये दावा किया जा रहा है कि 'ईस्टर संडे को श्रीलंका में हुए सीरियल बम धमाकों में मारी गई ये सबसे छोटी बच्ची की तस्वीर है'.
इस वायरल तस्वीर में एक शख़्स बच्ची के शव के क़रीब बैठा हुआ रोता दिखाई दे रहा है. फ़ेसबुक पर मौजूद कई धार्मिक ग्रुप्स में इस तस्वीर को इसी दावे के साथ शेयर किया गया है.
सीरियल बम धमाकों पर लिखे गए कुछ ब्लॉग्स भी हमें मिले जिनमें यह तस्वीर इस्तेमाल की गई है. एक ब्लॉग राइटर ने इस लड़की को 'कोलंबो की सबसे युवा शहीद' कहा है.
लेकिन रिवर्स सर्च से हमें पता चला कि यह तस्वीर एक साल पहले से फ़ेसबुक पर शेयर की जा रही है. यानी इस तस्वीर का ईस्टर संडे के हादसे से कोई वास्ता नहीं है.
रिवर्स सर्च से हमें फ़ेसबुक पर इस तस्वीर की जो सबसे पुरानी पोस्ट मिली, वो 12 मई 2018 की है.
इस पोस्ट में फ़ेसबुक यूज़र ने लिखा है, "मैं ये दुख कैसे सहूंगा. प्लीज़, कभी किसी पिता को दुनिया में ऐसी तकलीफ़ का सामना न करना पड़े."

Friday, April 12, 2019

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ब्रिटेन के गृह सचिव साजिद जाविद ने ट्वीट किया है, "मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूं कि जूलियन असांज पुलिस हिरासत में हैं और इस समय ब्रिटेन में कोर्ट की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं."
इक्वाडोर के राष्ट्रपति ने कहा कि अन्य देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने के बाद असांज के व्यवहार को लेकर हमारे देश का धैर्य ख़त्म हो गया है.
मोरेनो ने कहा, "ताज़ा मामला जनवरी 2019 का है, जब विकीलीक्स ने वैटिकन के दस्तावेज़ लीक किया था."
उन्होंने कहा, "ये और अन्य प्रकाशनों से दुनिया का ये संदेह स्पष्ट हो गया है कि असांज अभी भी विकीलीक्स से जुड़े हए हैं और इसलिए वो अन्य देशों के अंदरूनी मसलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं."
असांज का प्रत्यर्पण क्यों चाहता है अमरीका?
असांज ने साल 2006 में विकीलीक्स की स्थापना की. इसका उद्देश्य गोपनीय दस्तावेज़ और तस्वीरों को प्रकाशित करना था.
विकिलिक्स ने चार साल बाद तब सुर्खियां बटोरी जब उसने एक फ़ुटेज जारी किए जिसमें अमरीकी सैनिक इराक़ में हेलिकॉप्टर से आम नागरिकों की हत्या कर रहे थे.
इस खुलासे में उनका साथ देने वाली अमरीकी विश्लेषक चेल्सी मैनिंग को साल 2010 में अमरीका मे गिरफ़्तार किया गया. उनपर आरोप था कि उन्होंने 7 लाख गोपनीय दस्तावेज़, वीडियो और डिप्लोमैटिक केबल का खुलासा एंटी सीक्रेसी वेबसाइट के साथ मिलकर किया.
चेल्सी के मुताबिक़ उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि अमरीका की विदेश नीति पर बहस शुरु हो लेकिन अमरीका का कहना है कि उन्होंने ऐसा करके कई जानों को ख़तरे में डाल दिया है.
पिछले साल वर्जीनिया राज्य में जारी किए गए असांजे के ख़िलाफ़ अभियोग में आरोप है कि उन्होंने 2010 में मैनिंग के साथ रक्षा विभाग की गोपनीय जानकारी हासिल करने की साज़िश रची थी.
अभियोग के मुताबिक़ मैनिंग ने जनवरी और मई 2010 के बीच अमरीकी विभागों और एजेंसियों से चार डेटाबेस डाउनलोड किए और इसे विकिलीक्स को मुहैया कराई.
अमरीका का न्याय विभाग ने इसे "संयुक्त राज्य अमरीका के इतिहास की सबसे बड़ी गोपनीय जानकारी के साथ छेड़छाड़'' का मामला बताया है.
अभियोग का आरोप है कि कंप्यूटर पर पासवर्ड को क्रैक किया गया. चेल्सी मैनिंग ने इन दस्तावेज़ों के लिए इस तरह से लॉग ऑन किया ताकि जांचकर्ताओं के लिए खुलासे के स्रोत को तय कर पाना कठिन हो.
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में इलेक्टोरल बॉन्ड पर तत्काल कोई रोक नहीं लगाई है लेकिन सभी पार्टियों से अपने चुनावी फंड की पूरी जानकारी देने को कहा है.
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़, कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि चुनावी बॉन्ड के मार्फ़त चंदा देने वालों की पूरी जानकारी, कितना चंदा मिला, हर बॉन्ड पर कितनी राशि प्राप्त हुई उसकी पूरी जानकारी चुनाव आयोग को उपलब्ध कराएं.
कोर्ट ने कहा है कि 15 मई तक मिले चंदे की सारी जानकारियां एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में 30 मई तक चुनाव आयोग के पास जमा कराई जाएं.
सुप्रीम कोर्ट ने वित्त मंत्रालय को आदेश दिया कि वो अपने नोटिफ़िकेशन में संशोधन करे और इलेक्टोरल बॉन्ड की ख़रीद के लिए अप्रैल और मई में दिए गए पांच अतिरिक्त दिन को हटाए.
इस मामले में सुनवाई के दौरान पहले अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट से फिलहाल हस्तक्षेप न करने की अपील की थी.

Tuesday, April 2, 2019

थाली से खेतों तक का सफ़र

पूर्वोत्तर राज्य असम के पकवानों का ज़ायक़ा दिल लुभाता रहा है, राज्य की पारंपरिक थाली में व्यंजनों की विविधता है और यही इस इलाक़े की पहचान भी है.
कई ऐसे व्यंजन हैं जो अहोम राजाओं के दौर से प्रचलित हैं. राज्य के कुछ-कुछ इलाक़ों में बनने वाले व्यंजन वैसे ही हैं जैसे बर्मा और थाईलैंड में पकाये जाते हैं. वैसे तो चावल ही यहाँ का मुख्य आहार है. मगर अब दालें और सब्ज़ियां भी उगाई जा रही हैं.
ऊपरी असम से लेकर निचले असम तक पारंपरिक खाने की थाली में परोसे गए व्यंजन अलग-अलग होते हैं और उनका स्वाद भी. अहोम लोगों के पकवान या फिर बोडो और अन्य जनजातियों के व्यंजन एक दूसरे से काफ़ी अलग हैं और उनका स्वाद भी क्षेत्र के हिसाब से बदलता रहता है.
कश्मीर से लेकर पूर्वी और मध्य भारत के अलावा दक्षिण भारत में भी खाना पकाने के तरीक़े अलग रहे हैं.
ये लोगों के स्वाद पर ही निर्भर है जहाँ मध्य और दक्षिण भारत में तेज़ मसालों का इस्तेमाल होता है, वहीं असम में भी पकवान मसालेदार होते हैं. लेकिन पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड में मसालों का कम इस्तेमाल किया जाता है.
दूसरे प्रदेशों की तरह ही असम के किसान भी अपने व्यंजनों का उत्सव मनाते हैं मगर असम में मूलतः आजीविका के लिए धान और सब्जियां उगाई जाती हैं और लोग अपने खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं.
इनमें ज़्यादा संख्या महिलाओं की है जो खेतों में काम करती हैं. राज्य के मुख्य त्योहार भी फ़सलों की कटाई और बुवाई के इर्द-गिर्द ही मनाए जाते हैं. नाबानिदी गोगोई जोरहट के बोलोमा मोरन गाँव के रहने वाले एक किसान हैं.
गोगोई और उनका परिवार आजीविका के लिए खेती करता रहा है, वो धान की फ़सल को घाटे को सौदा मानते हैं.
बीबीसी से बात करते हुए नाबानिदी गोगोई कहते हैं कि सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में उन्होंने सिर्फ़ अख़बारों में पढ़ा है या टीवी पर सुना है.
वे कहते हैं, "मैं जब अपना धान बेचने मंडी जाता हूँ तो मुझे उतने भी पैसे नहीं मिलते जितने मैंने उगाने के लिए ख़र्च किए हैं. उलटा जेब से ही ख़र्च हो रहा है."
बाज़ार और उचित मूल्य के अभाव में असम के किसानों का संघर्ष लगातार जारी है. कभी बाढ़ की मार तो कभी मौसम, इनके लिए खेती करना मुश्किल भरा काम होता जा रहा है. हर साल ऊपरी और निचले असम के कई इलाके़ बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं.
बाढ़ से फ़सलों का नुक़सान तो होता ही है मगर जब पानी उतरता है तो ज़मीन उपजाऊ नहीं रह जाती. किसानों को इस ज़मीन को फिर से खेती के लायक़ बनाने के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है और इस काम में महीनों या फिर पूरा साल भी लग सकता है.
वैसे जो धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने तय किया है, वो 1500 रुपये प्रति क्विंटल है जबकि किसानों को 900 रुपये भी नहीं मिल पाते हैं. इसीलिए असम के किसान संघर्ष ही कर रहे हैं. इस संघर्ष में महिला किसानों की भागीदारी ज़्यादा है क्योंकि वो घर भी संभालती हैं और खेत भी.
इसका जवाब तलाश करने के लिए मैं जोरहट के एक गाँव पहुंचा, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं खेतों में काम कर रहीं थी. वो पुरानी फसल काट रहीं थीं ताकि नई फ़सल बोने के लिए खेत तैयार हो सकें. ये पारंपरिक त्योहार बिहु का भी मौक़ा था.
पारंपरिक वेशभूषा में ये महिला किसान, मेहनत के साथ साथ खतों में सांस्कृतिक बिहु के नाच का आनंद भी ले रहीं थीं. उनके साथ बच्चे भी हाथ बंटा रहे थे. महिला किसानों के झुंड ने हमें घेर लिया और एक-एक करके अपनी परेशानियां साझा करनी शुरू कर दीं.
वो बताने लगीं कि आज भी वो उसी तरह से खेती कर रही हैं जैसी सौ साल पहले होती रही थी.
यहीं की गोनोबती भुइयां कहती हैं, "असम के ज़्यादातर किसानों के पास न मशीनें हैं ना ट्रैक्टर. हम खेती के लिए पूरी तरह से बारिश और नदी के पानी पर निर्भर हैं. खेतों में हल चलातें हैं क्योंकि ट्रैक्टर नहीं हैं और हाथों से ही बीज की बुवाई करते हैं. कुछ धान उगता है. कुछ दालें और सब्ज़ियां भी. मगर वो हमारे परिवार को चलाने के लिए काफ़ी नहीं हैं. इसलिए हमें मज़दूरी की तलाश भी करनी पड़ती है."
इसी इलाके के एक किसान ने बताया कि उन्हें खेती के लिए बैंकों से कर्ज़ भी नहीं मिल पाता. वो कहते हैं जब वो स्थानीय कृषि अधिकारी से लोन के लिए संपर्क करते हैं तो वे उन्हें सीधे बैंकों से संपर्क करने की सलाह दे डालते हैं. "कोई हमारी मदद नहीं करता."
महिला किसान अनीता सैकिया का आरोप था, "मौसम की वजह से या फिर कीड़े लग जाने की वजह से अगर फ़सल बर्बाद हो जाती है तो कोई स्थानीय अधिकारी देखने तक भी नहीं आता. मुआवज़ा तो दूर की बात है."
बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं, "सिलापथार और आसपास का इलाक़ा आज भी पिछड़ा हुआ है जबकि इसकी दूरी जोरहाट से ज़्यादा नहीं है. यहां के सैकड़ों गाँव ऐसे हैं जहां बिजली नहीं पहुंची है. उस पर से तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने कृषि को एक महँगा धंधा बना दिया है. अब यहां के युवा खेती छोड़ दूसरे राज्यों में जाकर नौकरियां करना बेहतर समझ रहे हैं."
धान की खेती में हो रहे घाटे की वजह से ऊपरी और निचले असम में किसान सब्ज़ियां भी उगा रहे हैं लेकिन उन्हें इसमें भी ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाता क्योंकि इनके पास न नई तकनीक है, न सिंचाई के उपकरण और ना ही बाज़ार. ऊपर से बाढ़ की मार और मौसम का क़हर.
असम के किसान देश के बाक़ी के हिस्सों के किसानों से इसलिए अलग हैं क्योंकि ये मूलतः आजीविका के लिए खेती करते आ रहे हैं और वो भी पारंपरिक तरीके़ से. पूरे राज्य के किसानों का एक बड़ा तबक़ा ऐसा है जिनकी ज़िंदगी में टेक्नॉलॉजी की कोई ख़ास भूमिका नहीं है.