Thursday, August 30, 2018

习近平将缺席非正式峰会 联合国气候谈判恐不乐观

据气候会谈内部人士称,中国国家主席习近平将缺席于纽约举行的气候峰会,这使人们对明年联合国巴黎气候会谈前的本次峰会能否取得进展表示忧虑。

习近平主席原计划参加联合国秘书长潘基文于9月23日召集的峰会,现在他会委派另一位中国高级官员前往,但这一说法尚未得到中方证实。

印度总理纳伦德拉·莫迪不久前也宣布将缺席本次会议。因此,这一消息对峰会组织者来说又是一次打击。莫迪计划于9月26日抵达纽约,而不会提前三天抵达去参加这次非正式气候峰会。此举让有关官员倍感无力,他们当中大多数人甚至弄不清楚环境部长是否会代替总理参会。

这种状况下,在刚刚结束的新德里召开的基础四国(巴西、南非、印度和中国)环境部长会议上做出的声明显得更为重要。这份联合声明重申了发展中国家长期以来的立场。

自联合声明发表以来,印度国内有报道称,发达国家曾试图游说菲律宾脱离志同道合的发展中国家集团。这一集团成立于3年前,以表明发展中国家在气候谈判中的立场为目标。这一集团的成员国还包括印度、中国、古巴、委内瑞拉、阿根廷、尼加拉瓜和沙特阿拉伯等。

去年华沙举行的联合国气候变化框架公约( )大会上,菲律宾曾代表这一集团向发达国家施压,要求他们兑现减排承诺并帮助贫穷国家应对气候变化带来的影响。峰会前夕,菲律宾大面积地区刚刚遭受台风海燕的重创,这使其发言更有说服力。

全球应对气候变化全面协议计划将于2015年年底前达成。目前,气候谈判正逐渐升温,联合国秘书长潘基文正是在此背景下召集非正式气候会谈。以美国和欧盟为领导的发达国家敦促全球192个国家做出具有法律约束力的温室气体减排承诺,印度一直对此表示强烈反对。

今年6月,在 波恩总部进行的一次谈判中,委内瑞拉代表团代表发展中国家集团提交了一份全球气候协议草案,这份草案立即遭到很多发达国家代表的反对。印度代表表示,他们正等待 秘书处准备的草案,并且希望草案能够在12月召开的利马峰会前完成。这样一来,各国政府在2015年截止日期前还有1年时间进行谈判。

定期参加 峰会的气候领域非政府组织的领导人近期感到十分担心,因为他们听闻法国政府正在秘密准备协议草案( 年气候峰会将在巴黎召开),这与导致 年哥本哈根大会失败的行为如出一辙。多数发展中国家的谈判代表都迫切希望在截止日期到来前数月发布草案。

联合国秘书长在此背景下召集非正式峰会,希望各国政府领导人能够为谈判施加必要的政治推动力。以美国总统巴拉克·奥巴马为代表的很多发达国家领导人都将出席这次峰会。中国和印度最高领导人的缺席将削弱本次会议的影响力。不过,如果发达国家领导人能就减排和帮助发展中国家做出郑重承诺,他们还是有可能重返谈判席。联合国秘书长设立的一个专家小组已经开始就如何资助所有国家的绿色经济发展提供建议。

联合国秘书长办公室将在峰会上促使企业和民间社会领导人跟政府领导人会面,希望各方能为应对气候变化做出新的承诺和行动计划。这是继哥本哈根峰会后,众多国家领导人首次就同一问题再次举行会晤。环保领域非政府组织正积极行动起来,准备在峰会期间在纽约等地游行响应。

峰会举办之前,潘基文曾说:“办法是有的,我们已经看到很多国家的政策和投资发生着重大改变,人民的生活方式和企业经营方式也在向着可持续的方向发展。很多人已经开始行动,是时候让各国领导人也参与进来,带领世界走向更安全的未来。”

Tuesday, August 28, 2018

सरकार ने किसान आत्महत्याओं के लिए एक नई ‘मुआवज़ा औ

में पंजाब सरकार ने किसान आत्महत्याओं के लिए एक नई ‘मुआवज़ा और राहत नीति’ को लागू किया. 2001 से पाँचवी बार बदली गयी इस नीति के तहत अब किसान आत्महत्याओं के सभी मामलों में पीड़ित परिवार को 3 लाख रुपए दिए जाने का प्रवधान है.
साथ ही किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनज़र पंजाब सरकार ने दो कमेटियों का गठन किया है. सुखबिंदर सिंह सरकारिया की अध्यक्षता में ग्रामीण आत्महत्याओं के लिए बनी ‘विधान सभा कमेटी’ और टी हक़ की अध्यक्षता में बनी ‘ऋण छूट समिति’. इन कमेटियों ने ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ बढ़ाने से लेकर ‘ऋण छूट’ तक पर किसानों के पक्ष में अपनी सिफ़ारिशें तो दे दीं हैं लेकिन उन पर ज़मीनी कार्रवाई अब तक शुरू नहीं हुई है.
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर सुखपाल सिंह लंबे समय से पंजाब में बढ़ते कृषि संकट पर काम कर रहे हैं. वे राज्य सरकार की ओर से कराए गए ‘डोर टू डोर’ सर्वे के समन्वयक भी रहे हैं. बीबीसी से एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि किसानी में चल रही ‘व्यापार की शर्तें’ किसानों के पक्ष में नहीं जा रहीं.
“बीजों से लेकर खाद, पानी और कीटनाशकों तक पर होने वाले ख़र्च बढ़ते जा रहे हैं और किसान की आमदनी उस हिसाब से बढ़ नहीं रही. यह बढ़ते क़र्ज़ और आत्महत्याओं के पीछे एक बड़ी वजह है. हालात ये है कि पहले जहां पंजाब की कुल कामगार जनसंख्या में से 63 प्रतिशत लोग किसानी थे, वहीं आज राज्य के सिर्फ़ 35 प्रतिशत लोग ही खेती कर रहे हैं.इस 35 प्रतिशत में भी सिर्फ़ 20 प्रतिशत किसान हैं, बाक़ी खेतिहर मज़दूर”.
आगे बरनाला ज़िले के ही बदरा गांव में हमारी मुलाक़ात गुरतेज दास से होती है. 45 वर्षीय गुरतेज के घर में कोई महिला नहीं हैं.
गांव की मुख्य सड़क पर बने एक बदरंग धूल भरे घर में रहने वाले इस हिंदू किसान परिवार के पास सिर्फ़ एक एकड़ ज़मीन है. एक दशक पहले यह परिवार ज़मीन किराए पर लेकर खेती करता था. लेकिन जिस दिन गुरतेज के बड़े भाई निर्मल दास ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या की, उसी दिन यह परिवार बिखर गया.
गुरतेज ने अपना जीवन बड़े भाई के बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करने में लगा दिया. निर्मल के जाने के बाद गांव वालों ने बच्चों की माँ और बड़े भाई की पत्नी सरबजीत कौर से उनका विवाह भी करवा दिया था.
पर सरबजीत उनको और अपने बच्चों को छोड़ कर चली गईं. बिन माँ के बच्चों को बड़ा करना गुरतेज के लिए एक ऐसी चुनौती थी जिसका सामना करने के लिए न तो वह मानसिक तौर पर तैयार थे और न ही आर्थिक.
अपनी धूल भरी रसोई में चाय बानते हुए वह कहते हैं, “जब बच्चों की माँ गई तब छोटा वाला सिर्फ़ 6 साल का था. रातों को उठकर रोता था. अक्सर बीमार पड़ जाता. मुझसे जैसे बनता मैं वैसे खाना बनाकर बच्चों को खिलाता और उनकी देखभाल करता. उनको नहलाता, कपड़े पहनाता और सारे काम करता. फिर मज़दूरी करने जाता और वापस आकर उन्हें खाना बनाकर खिलाता.”
गुरतेज के दोनो बेटे अब बड़े हो रहे हैं. पर वो न तो ख़ुद खेती में लौटना चाहते हैं और न ही बच्चों को किसान बनाना चाहते हैं. वह कहते हैं, “जितनी खेती मैंने की है उससे मुझे यही लगा की किसानी में न ही पड़ें तो अच्छा.
खेती से तो अच्छा है कि बच्चे कोई दुकान खोल लें या मज़दूरी कर लें या किसी फ़ैक्टरी में लग जाएं. खेती में आमदनी होती नहीं, किसान के ख़र्चे बढ़ते जा रहे हैं. इसलिए जब कोई रास्ता नहीं दिखता तो वह सुसाइड कर लेता है. खेती में कुछ नहीं मिलना, उल्टा जान ज़रूर जानी है.”
बदरा गांव से विदा लेते हुए ही हमें पड़ोस के संगरूर जिले के खोखर खुर्द गांव में एक 23 साल के किसान की आत्महत्या की ख़बर मिली.
कर्ज़ और बैंक के नोटिसों ने परेशान नमृत पाल ने 14 जून 2018 की रात रेल की पटरी पर लेटकर आत्महत्या कर ली. पीछे दो छोटे बच्चे, पत्नी और बूढ़े माँ-बाप को छोड़ गए नमृत अक्सर उदास रहते और अपनी माँ से कहते, ‘माँ मेरा मरने को जी करता है’. अपनी शादी की तस्वीर में नमृत किसी नौजवान रंगरूट की तरह लगते हैं. अपने पिता के मातम में मासूमियत से चिप्स खाते उनके बच्चे, उनको ‘लाड़ी-लाड़ी’ कहकर पुकारती उनकी पत्नी और दहाड़ें मार मार कर रोती उनकी माँ गुरमीत कौर को देखकर पंजाब की एक स्याह तस्वीर मेरे सीने में धंस गई.
आगे पंजाब छोड़ते हुए हमारी मुलाक़ात ‘भारतीय किसान यूनियन एकता-उगराहन’ नामक स्थानीय किसान संगठन के बैनर तले एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे किसानों से हुई. पीले झंडे लिए जत्थों में चलते हुए ये किसान सरकार की ओर से धान की रोपाई की तय तारीख़ के ख़िलाफ़ अपना विरोध जताने बरनाला शहर जा रहे थे.
मैंने वहां खड़े किसानों से बातचीत में पूछा कि हरित क्रांति की इस धरती पर आज इतने किसान ख़ुदकुशी क्यों कर रहे हैं.
तभी अपने संगठन का झंडा हाथ में पकड़े एक बुज़ुर्ग किसान ने अपना नाम बारह सिंह बताते हुए कहा, “हरित क्रांति से सिर्फ़ बीज कंपनियों, पेस्टीसाइड कंपनियों और ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनियों का फ़ायदा हुआ है. हमें महंगे बीज, महंगी खाद बेच गए कंपनी वाले. बड़े ट्रैक्टरों बेच के मुनाफ़ा कमा गई कंपनियां. हमें क्या मिला? सिर्फ़ इन सामनों को ख़रीदने के लिए लिया गया कर्ज़ा.
कभी कीड़ों से तो कभी ओलों से फ़सल ख़राब हो जाती है. सरकार की तरफ़ से कोई मुआवज़ा या लोन माफ़ी नहीं मिलती. हर बार सरकार पंजाब के किसानों के संकट को सिर्फ़ कमेटियों की सिफ़ारिशों में दबा के रख देना चाहती है.
ज़मीन पर मिमिनम सपोर्ट प्राइस पर फ़सल बेचने के लिए भी हमें लड़ाइयां लड़नी पड़ती हैं. ऐसे में किसान आत्महत्या न करे तो और क्या करे”.
11 जुलाई को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को उनकी मुआवज़ा और राहत नीति पर फटकार लगाते हुए कहा कि मुआवज़ा सिर्फ एक अंतरिम उपाय है.
सरकार को बढ़ती किसान आत्महत्यायों के कारणों पर एक हलफनमा दाख़िल करने का आदेश देते हुए अदालत यह भी पूछा की सरकार बढ़ती किसान आत्महत्यायों को रोकने के लिए क्या दीर्घकालिक उपाय कर रही है. फिलहाल सरकार अदालत में प्रस्तुत करने के लिए जवाब तैयार कर रही है पर इस जवाब का असली इंतज़ार तो पंजाब के किसानों को है